पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 23 जनवरी 2026 को एकरूप सहमति दिशानिर्देशों में संशोधन अधिसूचित किया, जिससे औद्योगिक पर्यावरणीय अनुपालन में कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं। सबसे उल्लेखनीय परिवर्तन यह है कि उद्योगों के लिए परिचालन सहमति (CTO) अब अनिश्चितकाल तक वैध रहेगी। पहले CTO का प्रत्येक 5 वर्ष में नवीनीकरण अनिवार्य था। नए ढांचे में उद्योग एक ही भुगतान में 5 से 25 वर्ष की अवधि का प्रसंस्करण शुल्क जमा कर सकते हैं, जिससे व्यवसायों पर प्रशासनिक भार और अनुपालन व्यय में उल्लेखनीय कमी आएगी।
इस संशोधन के तहत लाल श्रेणी के उद्योगों, यानी सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले क्षेत्रों, के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की समयसीमा 120 दिनों से घटाकर 90 दिन कर दी गई है। तृतीय-पक्ष सत्यापन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अब पर्यावरण लेखापरीक्षकों को सरकारी निरीक्षकों के स्थान पर अनुपालन सत्यापन निरीक्षण करने का अधिकार दिया गया है। मान्यता प्राप्त लेखापरीक्षकों की राष्ट्रीय पंजिका के ज़रिए जवाबदेही बनाए रखते हुए इससे निगरानी प्रक्रिया अधिक कुशल बनेगी।
इसके अतिरिक्त, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्यों को चार नए कार्बन-सघन उद्योगों तक बढ़ाया गया है: द्वितीयक एल्यूमीनियम प्रगलन, पेट्रोलियम रिफाइनरियां, पेट्रोकेमिकल विनिर्माण और वस्त्र उत्पादन। इस विस्तार से 208 अतिरिक्त औद्योगिक इकाइयां 2023 में स्थापित भारतीय कार्बन बाजार अनुपालन ढांचे में शामिल होंगी। यह संशोधन उद्योग के लिए विनियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाते हुए पेरिस समझौते के तहत भारत के राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान की दिशा में प्रगति तेज करने में मदद करेगा। पर्यावरणविद समूहों ने उत्सर्जन लक्ष्य विस्तार का सतर्कतापूर्वक स्वागत किया है, लेकिन लेखापरीक्षक-आधारित अनुपालन मॉडल से सरकारी निगरानी कम होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
