प्रकाशित: 6 दिसंबर 2025समाचार स्रोतशासन
दादाभाई नौरोजी की 200वीं जयंती
भारत ने दादाभाई नौरोजी (जन्म: 4 सितंबर 1825) की 200वीं जयंती मनाई। वे भारतीय राष्ट्रवाद और आधुनिक आर्थिक चिंतन के प्रमुख आधार-स्तंभों में से एक थे। 'भारत के महान बुजुर्ग' के नाम से प्रसिद्ध नौरोजी पारसी बुद्धिजीवी, शिक्षाविद और राजनीतिक नेता थे। उनके योगदान ने प्रारंभिक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा दी।
नौरोजी को सबसे अधिक धन-निकास सिद्धांत (Drain of Wealth Theory) के लिए याद किया जाता है, जिसे उन्होंने अपनी ऐतिहासिक 1901 की पुस्तक 'पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया' में प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत के अनुसार ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के कारण भारत के संसाधन, राजस्व और संपत्ति व्यवस्थित रूप से ब्रिटेन जा रहे थे, जिससे भारतीय जनता गरीब हो रही थी।
1892 में नौरोजी ने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में चुने जाने वाले पहले भारतीय बनकर इतिहास रचा। वे लिबरल पार्टी के सदस्य के रूप में फिन्सबरी सेंट्रल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (स्थापना 1885) के संस्थापक पिता के रूप में उन्होंने तीन बार इसके अध्यक्ष के रूप में कार्य किया (1886, 1893, 1906)। उन्होंने बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे भावी नेताओं का मार्गदर्शन किया। 200वीं जयंती पर विभिन्न राजनीतिक वर्गों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दादाभाई नौरोजी का धन-निकासी सिद्धांत क्या है?
इस सिद्धांत के अनुसार ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के कारण भारत के संसाधन, राजस्व और धन व्यवस्थित रूप से ब्रिटेन जा रहे थे, जिससे भारतीय गरीब हो रहे थे। इसे उन्होंने 1901 की पुस्तक में प्रतिपादित किया।
दादाभाई नौरोजी को 'भारत का महान बुज़ुर्ग' क्यों कहा जाता है?
भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति उनके आजीवन समर्पण, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में उनकी बुनियादी भूमिका और भारत व ब्रिटेन दोनों जगह भारतीय अधिकारों की दशकों तक वकालत करने के कारण उन्हें यह उपाधि मिली।
ब्रिटिश संसद में नौरोजी की ऐतिहासिक उपलब्धि क्या थी?
1892 में वे फिन्सबरी सेंट्रल से लिबरल पार्टी के सदस्य के रूप में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए चुने गए पहले भारतीय बने।
नौरोजी ने कितनी बार INC अध्यक्ष के रूप में कार्य किया?
तीन बार — 1886, 1893 और 1906 में।
2025 में उनकी 200वीं जयंती का महत्व क्या है?
यह उपनिवेशवाद की उनकी आर्थिक आलोचना और धन-निकासी सिद्धांत पर फिर से विचार करने का अवसर देती है, जो औपनिवेशिक मुआवजे की चर्चाओं में आज भी प्रासंगिक है।