भारत और ऑस्ट्रेलिया ने 24 सितंबर 2025 को नई दिल्ली के वाणिज्य भवन में जैविक उत्पादों के लिए पारस्परिक मान्यता व्यवस्था पर हस्ताक्षर किए। यह कदम भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते की दिशा में व्यावहारिक प्रगति दिखाता है, क्योंकि दोनों देश एक-दूसरे की जैविक प्रमाणन व्यवस्था पर भरोसा जताकर व्यापार को सरल बनाना चाहते हैं।
भारत की ओर से इस व्यवस्था को लागू करने वाली संस्था कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण है, जबकि ऑस्ट्रेलिया की ओर से कृषि, मत्स्य और वानिकी विभाग जुड़ा है। दायरे में बिना प्रसंस्करण वाले पौध-आधारित उत्पाद शामिल हैं, लेकिन समुद्री शैवाल, जलीय पौधे और ग्रीनहाउस फसलें बाहर रखी गई हैं। पौध-आधारित सामग्री से बने प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और वाइन भी इसके दायरे में हैं।
भारतीय निर्यातकों के लिए मुख्य लाभ यह है कि अनुपालन की प्रक्रिया सरल होगी, दोहरे प्रमाणन की जरूरत घटेगी और ऑस्ट्रेलियाई बाजार तक पहुंच आसान होगी। सरकारी सूचना के अनुसार 2024-25 में भारत का ऑस्ट्रेलिया को जैविक निर्यात 89.6 लाख अमेरिकी डॉलर और 2,781.58 मीट्रिक टन रहा, जिसमें ईसबगोल भूसी, नारियल दूध और चावल प्रमुख रहे। इससे जैविक व्यापार में भरोसा और पारदर्शिता बढ़ने की बात भी जुड़ी है, क्योंकि मानक और प्रमाणन व्यवस्था को दोनों पक्ष औपचारिक रूप से स्वीकार कर रहे हैं। व्यापार नीति के स्तर पर यह लागत और समय घटाने वाला कदम है, इसलिए निर्यातकों और उत्पादकों के लिए इसका महत्व बनता है। परीक्षा की दृष्टि से यह विषय अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कृषि निर्यात, मानक और प्रमाणन, गैर-शुल्क बाधाओं में कमी तथा भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक संबंधों से जुड़ता है। स्टैटिक जीके में इसे जैविक खेती, निर्यात प्रोत्साहन संस्थाओं और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के साथ पढ़ना उपयोगी है।
