4–5 मार्च 2026 को भारतीय रुपया बाज़ार के मनोवैज्ञानिक रूप से अहम 92 के स्तर को पार कर गया (दिन के कारोबार में ₹92.17 तक गिरा)। इसके पीछे कई कारण थे: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने की आशंका से ब्रेंट क्रूड में 10% की उछाल, FII निकासी में तेजी और Q3 FY2025-26 में चालू खाता घाटा (CAD) का GDP के 1.3% तक बढ़ना।

भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 80% आवश्यकता आयात करता है, इसलिए वह तेल कीमतों के झटकों के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। विश्लेषकों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में प्रत्येक 10 डॉलर प्रति बैरल वृद्धि से भारत का चालू खाता घाटा GDP के लगभग 0.4% तक बढ़ जाता है। RBI ने 600 अरब डॉलर से अधिक के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ बाजार में हस्तक्षेप किया। दिसंबर 2025 तक बाह्य वाणिज्यिक उधार (ECB) 44.36 अरब डॉलर था।

राजस्थान के लिए, जो परिवहन और कृषि पंप चलाने के लिए ईंधन आयात पर बहुत निर्भर करता है, बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें किसानों और लॉजिस्टिक्स संचालकों की लागत सीधे बढ़ाती हैं।