आईएनएसवी कौंडिन्य भारत की समुद्री विरासत को आधुनिक समय में फिर से सामने लाने की एक महत्वपूर्ण पहल है। रक्षा और संस्कृति मंत्रालयों से जुड़ी इस पहल में एक पारंपरिक लकड़ी का नौकायन पोत तैयार किया गया है, जिसे बिना वेल्डिंग या रिवेटिंग के बनाया गया। परीक्षा की दृष्टि से यह विषय केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं है; इसमें विज्ञान और तकनीक, संस्कृति, समुद्री इतिहास, विरासत संरक्षण और भारत की सॉफ्ट पावर जैसे पहलू भी जुड़ते हैं।

यह पोत अजंता गुफाओं की 5वीं शताब्दी ईस्वी की चित्रकारी में दिखाए गए जहाज से प्रेरित है। परियोजना की शुरुआत जुलाई 2023 में संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और होडी इनोवेशन्स के बीच त्रिपक्षीय समझौते से हुई, जिसमें वित्तपोषण संस्कृति मंत्रालय ने किया। निर्माण में केरल के कुशल कारीगरों ने लकड़ी के तख्तों को नारियल रेशे की रस्सी, नारियल फाइबर और प्राकृतिक रेज़िन से जोड़ने की पारंपरिक स्टिचिंग तकनीक अपनाई।

भारतीय नौसेना ने डिजाइन, तकनीकी सत्यापन और निर्माण प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभाई। ऐसे प्राचीन पोतों के ब्लूप्रिंट उपलब्ध नहीं थे, इसलिए डिजाइन को चित्रात्मक स्रोतों से समझकर तैयार किया गया और आईआईटी मद्रास के समुद्र इंजीनियरिंग विभाग में हाइड्रोडायनामिक मॉडल टेस्टिंग से परखा गया। कौंडिन्य का नाम उस पौराणिक भारतीय नाविक से जुड़ा है जिसे भारतीय महासागर पार कर दक्षिण-पूर्व एशिया तक समुद्री संपर्क का प्रतीक माना जाता है। स्टैटिक जीके में अजंता गुफाएं, प्राचीन भारतीय व्यापार मार्ग, पारंपरिक जहाज निर्माण और सांस्कृतिक कूटनीति इससे जुड़े संभावित लिंक हैं। प्रीलिम्स में संस्था, तकनीक और स्थान से सवाल बन सकते हैं, जबकि मुख्य परीक्षा में विरासत संरक्षण, समुद्री क्षमता और सांस्कृतिक कूटनीति के उदाहरण के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है।