मार्च 2026 के अंत में कच्चे तेल की कीमतें 123 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गईं — फरवरी 2026 के 69 डॉलर/बैरल से लगभग दोगुनी — और भारतीय रुपया 94.1 रुपये प्रति डॉलर के सर्वकालिक निम्नतम स्तर पर आ गया। इस दोहरे संकट से निपटने के लिए भारत पश्चिम एशियाई तेल का भुगतान स्थानीय मुद्राओं में करने की संभावना तलाश रहा है। भारत अपनी लगभग 85% कच्चे तेल की जरूरतें आयात से पूरी करता है, जिसमें पश्चिम एशिया (सऊदी अरब, UAE, इराक) प्रमुख स्रोत है। स्थानीय मुद्रा में भुगतान से डॉलर की मांग घटेगी, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा और डी-डॉलराइजेशन के भारत के व्यापक लक्ष्य को बल मिलेगा। भारतीय रिजर्व बैंक और पेट्रोलियम मंत्रालय खाड़ी देशों के साथ द्विपक्षीय मुद्रा स्वैप या निपटान ढाँचे बनाने के लिए समन्वय कर रहे हैं। यह प्रयोग सफल रहा तो इससे भारत का चालू खाता घाटा कम होगा, रुपये को स्थिरता मिलेगी और SWIFT-आधारित डॉलर भुगतान पर निर्भरता घटेगी।