कोकिंग कोल को खान और खनिज विकास और विनियमन अधिनियम, 1957 के तहत महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिज के रूप में अधिसूचित किया गया है। यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि भारत के पास कोकिंग कोल के 37.37 अरब टन भंडार हैं, फिर भी इस्पात क्षेत्र की लगभग 95% जरूरत आयात से पूरी होती है। भारी आयात निर्भरता से विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह होता है और इस्पात जैसी बुनियादी औद्योगिक श्रृंखला में आपूर्ति जोखिम बढ़ता है।

कोकिंग कोल सामान्य ऊर्जा कोयले जैसा विषय नहीं है। ब्लास्ट फर्नेस प्रक्रिया में इसे कोक में बदला जाता है, जो इस्पात निर्माण में ईंधन और अपचायक दोनों की भूमिका निभाता है। उत्पादन के लिए अच्छी गुणवत्ता वाला कोकिंग कोल चाहिए, जबकि भारतीय कोकिंग कोल में राख की मात्रा अधिक मानी जाती है। इसलिए उसे सीधे इस्तेमाल करने के बजाय अक्सर मिश्रण की जरूरत पड़ती है और बड़ी जरूरत ऑस्ट्रेलिया तथा अमेरिका जैसे स्रोतों से आयात के ज़रिए पूरी होती है।

महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिज का दर्जा मिलने से केंद्र सरकार को खोज, खनन ब्लॉकों की नीलामी और आवंटन पर रणनीतिक प्राथमिकता देने का आधार मिलता है। इसी व्यापक सूची में लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, टाइटेनियम और दुर्लभ पृथ्वी तत्व जैसे खनिज भी आते हैं, इसलिए कोकिंग कोल को अब औद्योगिक सुरक्षा के संदर्भ में पढ़ना चाहिए। परीक्षा में इसे इस्पात उद्योग के लिए कच्चे माल की सुरक्षा, आयात-निर्भरता और औद्योगिक आत्मनिर्भरता के उदाहरण के रूप में पढ़ना चाहिए। प्रीलिम्स में अधिनियम, खनिज का दर्जा, भंडार और आयात-निर्भरता पूछे जा सकते हैं, जबकि मुख्य परीक्षा में आत्मनिर्भरता, विदेशी मुद्रा बचत और औद्योगिक आपूर्ति सुरक्षा के संदर्भ में इसका उपयोग किया जा सकता है।