फरवरी 2026 तक भारत सरकार ने औपचारिक रूप से कहा कि वामपंथी उग्रवाद, जिसे आम तौर पर नक्सलवाद कहा जाता है, अपने पतन के 'अंतिम चरण' में पहुँच चुका है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि छत्तीसगढ़ में माओवादी विद्रोह के ऐतिहासिक केंद्र बस्तर में नक्सलवाद 'काफ़ी हद तक समाप्त' हो चुका है। कभी 10 राज्यों में फैला रेड कॉरिडोर अब बस्तर और झारखंड-बिहार सीमा के कुछ अलग-थलग इलाकों तक सिमट गया है।

सक्रिय सशस्त्र नक्सली कैडर की संख्या 2024 में 2,000 से अधिक थी, जो 2026 की शुरुआत तक घटकर लगभग 220 रह गई। केवल 2025 में सुरक्षा अभियानों के दौरान 317 नक्सली मारे गए, 800 से अधिक गिरफ्तार किए गए और लगभग 2,000 ने अपनी इच्छा से आत्मसमर्पण किया। इसके पीछे लगातार लागू किया गया 'समाधान' सिद्धांत रहा। इस पाँच सूत्री रणनीति में सुरक्षा अभियान, गुप्तचर सूचनाओं में सुधार, विकास कार्यों की पहुँच बढ़ाना, आत्मसमर्पण और पुनर्वास तथा रसद की आपूर्ति रोकना शामिल है।

प्रमुख उपलब्धियों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के महासचिव नम्बाला केशव राव सहित शीर्ष माओवादी नेताओं का मारा जाना, जिला कमांडर स्तर के प्रमुख नेताओं का आत्मसमर्पण और पहले दुर्गम रहे इलाकों में नए पुलिस थाने खोलना शामिल था। राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) ने गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत धन जुटाने वाले नेटवर्क पर मुकदमे चलाए, जिससे उन्हें धन मिलने के रास्ते बंद हुए। राजस्थान कभी वामपंथी उग्रवाद से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में नहीं रहा, फिर भी बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ की आदिवासी पट्टी को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS), प्रधानमंत्री आवास योजना और जनजातीय कल्याण योजनाओं के ज़रिए 'विकास को सुरक्षा से जोड़ने' की रणनीति अपनाने से लाभ मिलता है।