27 जनवरी 2026 को अंतरराष्ट्रीय होलोकॉस्ट स्मरण दिवस मनाया गया। यह दिन ऑशविट्ज़-बिर्केनाउ की मुक्ति की 81वीं वर्षगांठ से जुड़ा था। 27 जनवरी 1945 को सोवियत सैनिकों ने ऑशविट्ज़-बिर्केनाउ जर्मन नाज़ी यातना और विनाश शिविर को मुक्त कराया था। इसी ऐतिहासिक संदर्भ के कारण संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नवंबर 2005 में 27 जनवरी को होलोकॉस्ट पीड़ितों की स्मृति का अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया।

परीक्षा की दृष्टि से यह विषय अंतरराष्ट्रीय संबंध, विश्व इतिहास, मानवाधिकार और वैश्विक शासन से जुड़ता है। होलोकॉस्ट केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है; यह राज्य-प्रायोजित हिंसा, नस्लवाद, यहूदी-विरोध और असहिष्णुता के खतरों को समझने का आधार भी है। यूनेस्को के अनुसार इस दिन होलोकॉस्ट पीड़ितों की स्मृति को श्रद्धांजलि दी जाती है और यह याद दिलाया जाता है कि शिक्षा, दस्तावेज़ीकरण और स्मरण नफरत की विचारधाराओं के खिलाफ समाज की समझ मजबूत करते हैं। इसी वजह से यह विषय समसामयिकी और स्टैटिक जीके के बीच पुल का काम करता है।

2026 में भारत ने भी वैश्विक स्मरण कार्यक्रमों में भागीदारी की। इससे स्पष्ट होता है कि नरसंहार की रोकथाम केवल यूरोप के इतिहास का विषय नहीं, बल्कि मानवाधिकार, सहिष्णुता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़ा समकालीन मुद्दा है। प्रारंभिक परीक्षा में 27 जनवरी, संयुक्त राष्ट्र महासभा का 2005 वाला निर्णय, ऑशविट्ज़-बिर्केनाउ और शिक्षा-स्मरण का उद्देश्य पूछा जा सकता है। मुख्य परीक्षा में यह विषय मानव गरिमा, घृणा-भाषण, नरसंहार रोकथाम और वैश्विक नागरिकता शिक्षा से जोड़ा जा सकता है। स्टैटिक जीके के लिए इसे द्वितीय विश्व युद्ध, संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को के स्मृति-स्थल संरक्षण प्रयासों के साथ पढ़ना उपयोगी रहेगा।