27 जनवरी 2026 को अंतरराष्ट्रीय होलोकॉस्ट स्मरण दिवस मनाया गया। यह दिन 27 जनवरी 1945 को ऑश्विट्ज़-बिर्केनाउ की मुक्ति की याद से जुड़ा है और 2026 में इसकी 81वीं वर्षगांठ रही। भारत ने भी वैश्विक स्मरण कार्यक्रमों में भाग लिया, जहां नरसंहार की रोकथाम में शिक्षा और स्मरण के महत्व पर बल दिया गया। प्रीलिम्स के लिए 27 जनवरी, प्रस्ताव 60/7 और ऑश्विट्ज़-बिर्केनाउ का पोलैंड से संबंध याद रखने योग्य बिंदु हैं।

होलोकॉस्ट 1933-1945 के बीच नाज़ी शासन द्वारा यहूदियों और अन्य समुदायों के व्यवस्थित उत्पीड़न व हत्या से जुड़ी ऐतिहासिक घटना है। ऐतिहासिक विवरणों में बताया जाता है कि इसमें 60 लाख यहूदी मारे गए और रोमा, सोवियत युद्धबंदी, दिव्यांग व्यक्तियों, यौन अल्पसंख्यकों तथा राजनीतिक विरोधियों सहित लाखों अन्य लोग भी पीड़ित हुए। ऑश्विट्ज़-बिर्केनाउ सबसे बड़ा मृत्यु शिविर परिसर माना जाता है, जहां 11 लाख लोगों की हत्या हुई। इसकी मुक्ति ने नाज़ी अत्याचारों के पैमाने को दुनिया के सामने रखा और बाद के अंतरराष्ट्रीय नरसंहार की रोकथाम वाले विमर्श को मजबूत किया।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2005 में प्रस्ताव 60/7 से 27 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय होलोकॉस्ट स्मरण दिवस घोषित किया। संयुक्त राष्ट्र नरसंहार की रोकथाम, स्मरण-आधारित शिक्षा और भविष्य की पीढ़ियों को घृणा-आधारित हिंसा से सावधान करने पर जोर देता है। स्टैटिक जीके के लिए ऑश्विट्ज़-बिर्केनाउ का पोलैंड से संबंध, 1945 में सोवियत लाल सेना द्वारा मुक्ति, 1979 से UNESCO विश्व धरोहर स्थल का दर्जा और 1948 के संयुक्त राष्ट्र नरसंहार कन्वेंशन जैसे बिंदु उपयोगी हैं। प्रीलिम्स में तिथि, प्रस्ताव और स्थान पूछे जा सकते हैं, जबकि मुख्य परीक्षा में होलोकॉस्ट शिक्षा और नरसंहार की रोकथाम पर विश्लेषण पूछा जा सकता है।