प्रकाशित: 6 दिसंबर 2025शासन
डिजिटल संविधानवाद पर बहस: भारत में गोपनीयता, निगरानी और एल्गोरिदमिक पक्षपात
विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि डिजिटल क्षेत्र में भी स्वतंत्रता, गोपनीयता और समानता के संवैधानिक सिद्धांत लागू होने चाहिए। इसी विचार को डिजिटल संविधानवाद कहा जाता है। 2017 के पुट्टस्वामी निर्णय में गोपनीयता के अधिकार को मौलिक अधिकार माने जाने और 2018 में यूरोपीय संघ का सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR) लागू होने के बाद यह अवधारणा प्रमुखता से उभरी।
भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और भारतीय तार अधिनियम के तहत अनियंत्रित निगरानी, सहमति लेने की कमज़ोर व्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों में एल्गोरिदम के कारण होने वाला पक्षपात और डेटा संरक्षण नियमों का सीमित अमल प्रमुख चुनौतियाँ हैं। भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 कुछ चिंताओं से निपटता है, लेकिन इसमें आधुनिक निगरानी कानून और एल्गोरिदम के नियमन के प्रावधान नहीं हैं। सुझाए गए उपायों में डिजिटल अधिकार आयोग की स्थापना और जनता के उपयोग वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों के एल्गोरिदम की अनिवार्य जाँच शामिल है।
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Tसंविधान, प्रस्तावना, नागरिकता एवं मौलिक अधिकार
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एनएलयू जोधपुर की सूचना-सुरक्षा पीठ के साथ कौन-सा संयुक्त प्रमाणपत्र कार्यक्रम शुरू किया गया?
व्याख्या · सही उत्तर Bएनएलयू जोधपुर और आईआईआरआईएस ने संयुक्त रूप से साइबर-आधारित फोरेंसिक जांच और सम्यक् परीक्षण (CLFID) प्रमाणपत्र कार्यक्रम शुरू किया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
डिजिटल संविधानवाद क्या है और भारत के लिए इसका क्या महत्व है?
डिजिटल संविधानवाद के तहत स्वतंत्रता, गोपनीयता और समानता के संवैधानिक सिद्धांत डिजिटल क्षेत्र में लागू किए जाते हैं। भारत में इससे यह परखा जा सकता है कि अनियंत्रित निगरानी जैसी गतिविधियाँ संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप हैं या नहीं। 2017 के पुट्टस्वामी निर्णय में गोपनीयता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया। इस निर्णय और 2018 में यूरोपीय संघ का सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR) लागू होने के बाद यह बहस प्रमुखता से उभरी।
क्या डिजिटल संविधानवाद की अवधारणा किसी एक संगठन ने जारी की थी, और यूरोपीय संघ का सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन कब लागू हुआ?
डिजिटल संविधानवाद किसी एक संगठन द्वारा जारी की गई अवधारणा नहीं है। भारत में यह 2017 के पुट्टस्वामी निर्णय के बाद प्रमुखता से उभरी; इस निर्णय में गोपनीयता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया। यूरोपीय संघ का सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR) 25 मई 2018 से लागू है।
भारत में डिजिटल संविधानवाद से जुड़ी मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?
मुख्य चुनौतियाँ हैं—सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और भारतीय तार अधिनियम के तहत अनियंत्रित निगरानी, सहमति लेने की कमज़ोर व्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों में एल्गोरिदम के कारण होने वाला पक्षपात और डेटा संरक्षण नियमों का सीमित अमल।
क्या यह बहस किसी पुरानी व्यवस्था की जगह लेने की बात कहती है, और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 में क्या कमियाँ रह जाती हैं?
यह बहस किसी पुरानी व्यवस्था की जगह लेने का दावा नहीं करती। भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 कुछ चिंताओं से निपटता है, लेकिन इसमें आधुनिक निगरानी कानून और एल्गोरिदम के नियमन संबंधी प्रावधानों की कमी बनी हुई है।
डिजिटल संविधानवाद पर बहस में भारत के लिए कौन-से उपाय प्रस्तावित किए गए हैं?
सुझाए गए उपायों में डिजिटल अधिकार आयोग की स्थापना और जनता के उपयोग वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों के एल्गोरिदम की अनिवार्य जाँच शामिल है।