नीति आयोग ने 22 जनवरी 2026 को ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के हरित बदलाव का रोडमैप’ शीर्षक से एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की। इसके साथ सीमेंट और एल्युमीनियम क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन घटाने की अलग-अलग रणनीतियाँ भी जारी की गईं। यह 10 वर्षों की रणनीतिक कार्ययोजना है। इसका उद्देश्य भारत के 6.9 करोड़ सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों में ऊर्जा दक्षता बढ़ाना, नवीकरणीय स्रोतों से मिलने वाली बिजली का इस्तेमाल बढ़ाना, कामकाज की प्रक्रियाएँ बेहतर बनाना और हरित वित्त के साधनों तक उनकी पहुँच बढ़ाना है, ताकि वे कम कार्बन उत्सर्जन के साथ टिकाऊ विकास कर सकें।

भारत का सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 30 प्रतिशत योगदान देता है। विनिर्माण में इसकी हिस्सेदारी 36.2 प्रतिशत और निर्यात में 45.7 प्रतिशत है। यह क्षेत्र 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है, इसलिए इसका हरित बदलाव भारत की समग्र जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिए महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार, इस बदलाव में कई बाधाएँ हैं। इनमें स्वच्छ तकनीक अपनाने की भारी शुरुआती लागत, छोटे उद्यमों में ऊर्जा-कुशल तकनीकों की सीमित जानकारी, हरित वित्त और रियायती ऋण तक सीमित पहुँच तथा खासकर सूक्ष्म और लघु उद्यमों में तकनीक की कमी शामिल हैं।

रोडमैप में चरणबद्ध ढंग से काम करने का सुझाव दिया गया है। शुरुआत मध्यम उद्यमों की अनिवार्य ऊर्जा लेखापरीक्षा से होगी। इसके बाद तकनीकी आधुनिकीकरण योजनाओं के ज़रिए ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, छतों पर सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने, नवीकरणीय ऊर्जा खरीदने और 2025-2030, 2030-2032 तथा 2032-2035 के चरणों में कार्यान्वयन का दायरा बढ़ाने की बात कही गई है। रिपोर्ट में औद्योगिक समूहों में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए हरित केंद्र बनाने, ₹10,000 करोड़ की शुरुआती राशि के साथ एक समर्पित हरित सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम कोष स्थापित करने और इन उद्यमों की क्रेडिट रेटिंग में टिकाऊपन के मानक शामिल करने का भी प्रस्ताव है। नीति आयोग ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय को छह माह के भीतर कार्यान्वयन संबंधी दिशानिर्देश तैयार करने की सिफारिश की।