कृषि, बागवानी एवं पशुपालन
मुख्य तथ्य
- राजस्थान की कृषि बरानी विज्ञान और फसल-पशुधन एकीकरण का मेल है।
- बाजरा, गेहूं, सरसों, चना और ग्वार मुख्य आधार हैं।
- पानी का बेहतर उपयोग और मिट्टी की सेहत टिकाऊ उत्पादकता को आकार देती हैं।
- राठी, थारपारकर और नागौरी देशी अनुकूलन का मूल्य दिखाते हैं।
- राजस्थान की बागवानी में मसाले, फल, सब्जियां और फूलों की खेती शामिल हैं।
मुख्य बिंदु
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राजस्थान की कृषि बरानी विज्ञान और फसल-पशुधन एकीकरण का मेल है।
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बाजरा, गेहूं, सरसों, चना और ग्वार मुख्य आधार हैं।
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पानी का बेहतर उपयोग और मिट्टी की सेहत टिकाऊ उत्पादकता को आकार देती हैं।
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राठी, थारपारकर और नागौरी देशी अनुकूलन का मूल्य दिखाते हैं।
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राजस्थान की बागवानी में मसाले, फल, सब्जियां और फूलों की खेती शामिल हैं।
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योजनाओं को उस खेत-समस्या के आधार पर समूहित करना चाहिए जिसे वे हल करती हैं।
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राजस्थान की कृषि से RAS अभ्यर्थियों को क्या समझना चाहिए?
राजस्थान की कृषि को सिर्फ फसलों की सूची की तरह नहीं, बल्कि शुष्क क्षेत्र की विज्ञान-समझ और सार्वजनिक नीति के मेल की तरह पढ़ना चाहिए। राज्य में शुष्क पश्चिमी जिले, अर्द्ध-शुष्क पूर्वी मैदान, नहर-कमांड क्षेत्र, अरावली पट्टी और नम दक्षिण-पूर्वी इलाके, सब आते हैं। इसी वजह से एक ही राज्य रेतीली बरानी जमीन में बाजरा, रबी खेतों में सरसों और गेहूं, दक्षिणी और पूर्वी पट्टियों में मक्का, हाड़ौती क्षेत्र में सोयाबीन, और मसाला व औषधीय फसल पट्टियों में जीरा, धनिया, मेथी या इसबगोल पैदा कर सकता है। राजस्थान कृषि सांख्यिकी 2022-23 खंड परीक्षा के लिए एक साफ आधार देता है: राज्य में बाजरा प्रमुख खरीफ खाद्यान्न है और गेहूं प्रमुख रबी खाद्यान्न है। स्रोत आधार: https://rajas.rajasthan.gov.in/PDF/11222024122534PMAgriculturalStatistics.pdf
RPSC का कोण जलवायु-जोखिम और फसल-चयन के रिश्ते में है। पश्चिमी राजस्थान में वर्षा कम और अनिश्चित रहती है, वाष्पोत्सर्जन अधिक है और सूखे का दबाव बार-बार आता है, इसलिए मजबूत अनाज, दलहन, तिलहन, चारा फसलें और पशुधन परिवारों की टिकाऊ आजीविका को सहारा देते हैं। सिंचित कमांड क्षेत्रों में गेहूं, कपास, सरसों, सब्जियों और चारे की ओर फसल-बदलाव किया जा सकता है, लेकिन नहर सिंचाई की निकासी खराब हो तो जलभराव और लवणता जोखिम बन जाते हैं। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व राजस्थान में बेहतर वर्षा और काली या जलोढ़ मिट्टियां मक्का, सोयाबीन, गेहूं, चना और बागवानी को सहारा देती हैं।
इस विषय को व्यवस्थित करने का एक उपयोगी तरीका है:
| फ्रेम | राजस्थान का उदाहरण | परीक्षा में महत्व |
|---|---|---|
| बरानी अनाज | बाजरा, ज्वार, मक्का | कम वर्षा में खाद्य सुरक्षा |
| दलहन | चना, मोठ, मूंग, उड़द | प्रोटीन और नाइट्रोजन-स्थिरीकरण वाली फसल-चक्र उपयोगिता |
| तिलहन | सरसों, मूंगफली, तिल, सोयाबीन | नकद आय और खाद्य-तेल सुरक्षा |
| मसाले और औषधीय फसलें | जीरा, धनिया, मेथी, इसबगोल | शुष्क क्षेत्र में विविधीकरण और निर्यात मूल्य |
| चारा-पशुधन संबंध | बरसीम, लूसर्न, फसल अवशेष | डेयरी, ऊंट, भेड़ और बकरी अर्थव्यवस्था |
भारत-स्तर की कृषि आधार देती है, लेकिन राजस्थान यह परखता है कि अभ्यर्थी उसे स्थानीय संदर्भ में रख पाता है या नहीं। NCERT का कृषि अध्याय भारत की तीन फसल ऋतुओं और व्यापक फसल समूहों की पहचान कराता है; राजस्थान इस फ्रेम को पानी की कमी, रेतीली मिट्टी, नहर सिंचाई और मिश्रित फसल-पशुधन प्रणालियों के आधार पर बदल देता है। स्रोत आधार: https://ncert.nic.in/textbook/pdf/jess104.pdf
प्रीलिम्स के लिए दो गलतियों से बचें। पहली, यह न मानें कि राजस्थान की पूरी कृषि रेगिस्तानी कृषि ही है; हाड़ौती, मेवाड़ और पूर्वी मैदान जैसलमेर-बाड़मेर-बीकानेर से काफी अलग हैं। दूसरी, पशुधन को अलग से जोड़ा गया विषय न मानें। राजस्थान में पशुपालन खेती-प्रणाली का हिस्सा है, क्योंकि फसल अवशेष, चरागाह, डेयरी सहकारिताएं और सूखे में सहारा देने वाली आय परिवार की जीविका से जुड़ी हैं। इसलिए मजबूत उत्तर कृषि, बागवानी और पशुपालन को वर्षा, मिट्टी, सिंचाई, बाजार और योजनाओं से आकार लेने वाली एक अनुकूलनशील प्रणाली की तरह पढ़ता है।
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