आधुनिक राजस्थान (18वीं-20वीं शताब्दी)
मुख्य तथ्य
- 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मराठा चौथ और पिंडारी हमलों ने राजपूताना की राजस्व तथा सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर किया।
- 28 जुलाई 1787 का तुंगा युद्ध मैदान में अनिर्णायक रहा, किंतु सिंधिया का व्यापक लालसोट अभियान विफल रहा और वापसी में समाप्त हुआ।
- 1817-1818 की संधि शृंखला ने राजपूत रियासतों को ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन रखा, पर वंशगत निरंतरता बनी रही।
- राजपूताना की 1817-1818 संधि शृंखला में कोटा ने 26 दिसंबर 1817 को झालिम सिंह झाला के ज़रिए पहला समझौता किया।
- बिजोलिया किसान आंदोलन 1897 से 1941 तक अत्यधिक लाग-बाग और जागीरदारी शोषण के विरुद्ध विकसित हुआ।
मुख्य बिंदु
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1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मराठा चौथ और पिंडारी हमलों ने राजपूताना की राजस्व तथा सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर किया।
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28 जुलाई 1787 का तुंगा युद्ध मैदान में अनिर्णायक रहा, किंतु सिंधिया का व्यापक लालसोट अभियान विफल रहा और वापसी में समाप्त हुआ।
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1817-1818 की संधि शृंखला ने राजपूत रियासतों को ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन रखा, पर वंशगत निरंतरता बनी रही।
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राजपूताना की 1817-1818 संधि शृंखला में कोटा ने 26 दिसंबर 1817 को झालिम सिंह झाला के ज़रिए पहला समझौता किया।
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बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने नरेंद्र मंडल और गंग नहर के ज़रिए रियासती कूटनीति को राज्य-आधुनिकीकरण से जोड़ा।
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बिजोलिया किसान आंदोलन 1897 से 1941 तक अत्यधिक लाग-बाग और जागीरदारी शोषण के विरुद्ध विकसित हुआ।
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भगत और एकी आंदोलनों ने दक्षिणी राजस्थान की जनजातियों को सुधार, एकता और अन्यायपूर्ण देयों के विरोध के आधार पर संगठित किया।
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राजस्थान का राजनीतिक एकीकरण 18 मार्च 1948 के मत्स्य संघ से 1956 के राज्य पुनर्गठन तक चरणों में आगे बढ़ा।
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ब्रिटिश सर्वोच्चता से पहले अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में किन ताकतों ने राजपूताना को अस्थिर किया?
अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में राजपूताना में मराठा दबाव, पिंडारी लूट और तुंगा का युद्ध इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि इन्हीं ने राजपूत राज्यों की राजस्व-सुरक्षा, सैन्य क्षमता और ब्रिटिश सर्वोच्चता से पहले की सत्ता-व्यवस्था को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।
अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में राजपूताना में मुगल नियंत्रण ढीला पड़ा, मराठा दबाव बढ़ा और पिंडारी संकट ने राजस्व, गाँव और प्रशासन के संतुलन को तोड़ा।
मुगल नियंत्रण का ढीलापन और मराठा दबाव
- 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद राजपूताना पर मुगल नियंत्रण का अंतिम प्रभावी ढांचा ढीला पड़ गया।
- क्षेत्र चलायमान कर-वसूली तथा सैन्य दबाव की राजनीति में प्रवेश कर गया।
- अठारहवीं सदी के मध्य तक मराठा शक्ति उत्तर की ओर बढ़ी।
- सिंधिया तथा होल्कर घरानों ने जयपुर, मारवाड़, मेवाड़ और कोटा को लगातार दबाव, सौदेबाज़ी और कर-वसूली के क्षेत्र में बदल दिया।
- अजमेर और उसके आसपास के मार्ग विशेष रूप से संवेदनशील बने, क्योंकि उन पर नियंत्रण पूर्वी राजस्थान की आवाजाही और वसूली दोनों को प्रभावित करता था।
मारवाड़ और मराठा दबाव
- मारवाड़ के महाराजा विजय सिंह, जिनका शासन 1752 से 1793 तक रहा, अपने राज्य के राजस्व स्रोतों और वसूली-व्यवस्था को बचाने में लगे रहे।
- भीतर के दरबारी गुट और बाहर की चौथ मांग दोनों उन पर भारी पड़े।
- महादजी सिंधिया के ग्वालियर केंद्र और तुकोजी होल्कर के इंदौर केंद्र ने राजपूत राज्यों पर एक साथ सैन्य और आर्थिक दबाव बनाया।
पिंडारी संकट
- पिंडारी तेज़ गति से चलने वाले घुड़सवार लुटेरे थे।
- वे अक्सर होल्कर संरक्षण में, या बड़े मराठा अभियानों की छाया में, मेवाड़, मारवाड़ और हाड़ौती के गाँवों, अनाज ले जाने वाले रास्तों और कम सुरक्षा वाली बस्तियों पर धावा बोलते थे।
- उनका असर इसलिए गहरा था क्योंकि वे केवल धन नहीं लूटते थे, बल्कि खेती, बाजार और मालगुजारी की नियमितता तोड़ देते थे।
- जब देहात असुरक्षित हुआ तो राज्यों के लिए चौथ चुकाना, सेना रखना और स्थानीय सरदारों को नियंत्रित करना कठिन हो गया।
- इसलिए अठारहवीं सदी के अंतिम दशकों का संकट केवल युद्ध का नहीं, बल्कि राजस्व, गाँव और प्रशासन के टूटते संतुलन का संकट था।
तुंगा का युद्ध, 28 जुलाई 1787
| पक्ष | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 28 जुलाई 1787 |
| राजपूत पक्ष | जयपुर के सवाई प्रताप सिंह, जिनका शासन 1778 से 1803 तक रहा, ने मारवाड़ के महाराजा विजय सिंह के साथ मिलकर संघर्ष किया |
| विरोधी पक्ष | महादजी सिंधिया और उसके फ्रांसीसी प्रशिक्षित सेनापति बेनोइट डी बोइन |
| स्थान | आधुनिक दौसा जिले के लालसोट के निकट तुंगा गाँव के आसपास |
| सेना | समकालीन वर्णनों में लगभग 70,000 बताई गई संयुक्त राजपूत सेना |
| परिणाम | युद्धभूमि पर नतीजा अनिर्णायक रहा; सिंधिया का व्यापक लालसोट अभियान विफल हुआ और उसकी सेना पीछे हटी |
| महत्व | सिंधिया का व्यापक लालसोट अभियान विफल हुआ और उसकी सेना पीछे हटी, जिससे राजपूत पक्ष को कुछ समय की राहत मिली; मराठा शक्ति समाप्त नहीं हुई |
- तुंगा को 1790 के पाटन या मेड़ता से अलग पहचानना आवश्यक है।
- पाटन और मेड़ता बाद की लड़ाइयां थीं जिनमें डी बोइन ने स्थिति पलट दी।
सवाई प्रताप सिंह की सांस्कृतिक विरासत
- जयपुर के सवाई प्रताप सिंह केवल युद्धकालीन शासक नहीं थे।
- उनके समय में जयपुर चित्रशैली और दरबारी चित्रशाला को संरक्षण मिला।
- 1799 में हवा महल का निर्माण हुआ, जिसे लाल चंद उस्ताद ने रूप दिया।
- यह स्मारक बताता है कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राजनीतिक संकट एक ही समय में साथ-साथ चल रहे थे।
- तुंगा अभियान के बाद कुछ समय राहत रही, लेकिन 1790 के पाटन अभियान के साथ मराठा दबाव फिर बढ़ा।
- फिर भी जयपुर दरबार ने शहरी सौंदर्य, चित्रकला और राजकीय प्रतिष्ठा को जीवित रखा।
- आधुनिक राजस्थान की ओर संक्रमण को समझने के लिए यही द्वंद्व महत्वपूर्ण है।
1793 के बाद की उलझनें और 1817 की पृष्ठभूमि
- 1793 में विजय सिंह के बाद की उलझनों और 1803 तक बढ़े व्यापक संकट ने मारवाड़ को मान सिंह के शासन की ओर धकेला।
- मारवाड़ के महाराजा मान सिंह, जिनका शासन 1803 से 1843 तक रहा, उत्तराधिकार विवादों और दरबारी संघर्षों के बीच उभरे।
- कृष्णा कुमारी प्रसंग 1810 ने इस विघटन को अत्यंत मार्मिक रूप में सामने रखा।
- मेवाड़ की राजकुमारी विवाह-संघर्ष में जयपुर और जोधपुर प्रतिद्वंद्विता के बीच फँस गई और उसकी विष देकर हत्या कर दी गई।
- उसी समय पिंडारी आक्रमण 1808-1817 ने मेवाड़, मारवाड़ और हाड़ौती में असुरक्षा को और गहरा किया।
- 1817 तक अनेक राजपूत शासकों को लगने लगा कि ब्रिटिश मध्यस्थता के बिना मराठा-पिंडारी चक्र को रोका नहीं जा सकता।
- 1817-1818 की संधियों ने इस युग का अंत किया और राजपूताना को ब्रिटिश सर्वोच्चता के ढांचे में प्रवेश कराया।
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1MCQवर्तमान दौसा जिले के लालसोट के निकट 1787 की वह कौन-सी लड़ाई थी जिसमें जयपुर और मारवाड़ ने बेनोइट डी बोइन के नेतृत्व वाली सेना का सामना किया?
व्याख्या
विकल्प ख सही है क्योंकि प्रश्न में वर्णित लड़ाई तुंगा का युद्ध है, जो 28 जुलाई 1787 को लालसोट के निकट लड़ी गई थी, जहाँ जयपुर और मारवाड़ ने महादजी सिंधिया तथा बेनोइट डी बोइन का सामना किया। युद्धभूमि पर नतीजा अनिर्णायक रहा, लेकिन सिंधिया का व्यापक लालसोट अभियान विफल हुआ और उसकी सेना पीछे हट गई, जिससे राजपूत पक्ष को कुछ समय की राहत मिली। तिथि और दौसा-लालसोट का स्थान इसकी सबसे निर्णायक पहचान हैं।
विकल्प क गलत है क्योंकि पाटन का युद्ध 1790 का है, जिसमें डी बोइन ने पहले मिले झटके की भरपाई करते हुए राजपूत पक्ष को हराया। विकल्प ग भी गलत है क्योंकि मेड़ता का युद्ध भी 1790 की बाद की लड़ाई थी, जिसमें सिंधिया पक्ष ने तुंगा के बाद पहल वापस पा ली। विकल्प घ गलत है क्योंकि खानवा 1527 में राणा सांगा और बाबर के बीच लड़ा गया मध्यकालीन युद्ध था, इसलिए उसका संदर्भ पूरी तरह अलग है।
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