मुख्य तथ्य

  • राजस्थानी भाषा अनेक इंडो-आर्य भाषिक रूपों का समूह है; मारवाड़ी, मेवाती, मालवी और जयपुरी/ढूंढाड़ी प्रमुख क्षेत्रीय आधार हैं।
  • डिंगल और पिंगल आपस में जुड़ी साहित्यिक शैलियाँ हैं, अलग-अलग बंद विधाएँ नहीं।
  • बप्पा रावल और प्रारंभिक गुहिल मेवाड़ मेवाड़ की धार्मिक-राजनीतिक उत्पत्ति को 734 से जोड़ते हैं।
  • मेवाड़ के राणा कुम्भा एक ऐसे शासक थे जिनमें दुर्ग-निर्माण, संगीत, साहित्य और विजय-स्थापत्य सब एक साथ मिलते हैं।
  • मारवाड़ के राव जोधा ने 1459 में जोधपुर बसाया और मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव रखी, जबकि मारवाड़ के राव मालदेव का नाम 1544 के सम्मेल युद्ध से जुड़ा है।

मुख्य बिंदु

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    राजस्थानी भाषा अनेक इंडो-आर्य भाषिक रूपों का समूह है; मारवाड़ी, मेवाती, मालवी और जयपुरी/ढूंढाड़ी प्रमुख क्षेत्रीय आधार हैं।

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    डिंगल और पिंगल आपस में जुड़ी साहित्यिक शैलियाँ हैं, अलग-अलग बंद विधाएँ नहीं। साहित्यिक मारवाड़ी को डिंगल और पूर्वी राजस्थानी के साहित्यिक रूप को पिंगल कहा गया है।

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    बप्पा रावल और प्रारंभिक गुहिल मेवाड़ मेवाड़ की धार्मिक-राजनीतिक उत्पत्ति को 734 से जोड़ते हैं।

  4. 4

    मेवाड़ के राणा कुम्भा एक ऐसे शासक थे जिनमें दुर्ग-निर्माण, संगीत, साहित्य और विजय-स्थापत्य सब एक साथ मिलते हैं।

  5. 5

    मारवाड़ के राव जोधा ने 1459 में जोधपुर बसाया और मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव रखी, जबकि मारवाड़ के राव मालदेव का नाम 1544 के सम्मेल युद्ध से जुड़ा है।

  6. 6

    मेवाड़ के राणा सांगा, खानवा का युद्ध और हल्दीघाटी का युद्ध मध्यकाल के उत्तरार्ध की प्रतिरोध-परंपरा को दर्शाते हैं।

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    मीरा बाई सगुण कृष्ण भक्ति, दादू दयाल निर्गुण संत परंपरा और गुरु जाम्भोजी बिश्नोई परंपरा की पर्यावरण-संरक्षण संबंधी नैतिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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    राजस्थानी भाषा साहित्य और संस्कृति अकादमी जैसी संस्थाएं जीवंत साहित्यिक परंपरा को सहेजती और संरक्षित करती हैं।

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राजस्थान की भाषाएँ साहित्य और धार्मिक जीवन को कैसे जोड़ती हैं?

राजस्थान की भाषा-परंपरा क्षेत्रीय बोलियों, लोक-स्मृति, दरबारी काव्य, संत-वाणी और मौखिक कलाकारों के मेल से बनी, इसलिए इसे किसी एक दरबारी भाषा में समेटकर नहीं समझा जा सकता। इसकी शुरुआत क्षेत्रीय भाषिक समूहों से होती है। जनगणना 2011 के अनुसार राजस्थान की साक्षरता दर 66.1 प्रतिशत थी। इस सामाजिक संदर्भ में लिखित अध्ययन, मौखिक प्रस्तुति और भक्ति-साहित्य के प्रसार को साथ पढ़ना चाहिए।

प्रमुख भाषिक समूह और क्षेत्र

भाषा/बोलीक्षेत्रीय संबंधसांस्कृतिक भूमिका
राजस्थानी भाषाएँराजस्थान और आसपास के क्षेत्रब्रिटानिका इन्हें राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में बोली जाने वाली इंडो-आर्य भाषाएँ और बोलियाँ बताती है।
मेवातीउत्तर-पूर्व; अलवर-भरतपुर और पुराना मेवात सांस्कृतिक क्षेत्रचार प्रमुख समूहों में एक।
मालवीदक्षिणचार प्रमुख समूहों में एक।
मारवाड़ीपश्चिम; जोधपुर, बीकानेर और पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्रचार प्रमुख समूहों में एक।
जयपुरी या ढूंढाड़ीपूर्व-मध्य भाग; जयपुर और उसके आसपास के मैदानचार प्रमुख समूहों में एक।
मेवाड़ीउदयपुर-चित्तौड़गढ़ऐतिहासिक बोली।
हाड़ौतीकोटा-बूंदी-झालावाड़ क्षेत्रक्षेत्रीय बोली-संबंध।
  • यह भाषा-मानचित्र इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बोली-नाम, जिले और साहित्यिक रूप राजस्थान के स्रोतों में एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
  • दैनिक धार्मिक जीवन में यही बोलियाँ भजन, लोकगाथा, कथा, कहावत और पहेली को जीवित रखती हैं।
  • व्यापार-मार्ग, तीर्थ-परिक्रमा और दरबारी क्षेत्र भाषिक क्षेत्रों से मिलते हैं। इसलिए एक ही शब्द भाषिक, साहित्यिक और सामाजिक अर्थ रख सकता है।

प्रारंभिक पाठ और लोक-शब्दावली

आधारसंबंधित विवरणमहत्त्व
उद्योतनसूरि की कुवलयमालाराजरास इसे 8वीं सदी से जोड़ता है और 18 देशी भाषाओं, जिनमें मरु भी शामिल है, का उल्लेख बताता है।भाषा-इतिहास का आरंभिक पाठ-आधार।
आड़ी और हियालीराजस्थानी लोकसाहित्य की पहेली-शब्दावलीइसलिए पहेली, कहावत और मुहावरे गीत और कथा के साथ पढ़े जाते हैं।
डिंगलसाहित्यिक मारवाड़ीवीर काव्य से खास जुड़ाव, पर केवल उसी तक सीमित नहीं।
पिंगलपूर्वी राजस्थानी का साहित्यिक रूपकई काव्य-परंपराओं में इस्तेमाल हुई शैली।

संस्थाएँ, लेखक और मौखिक कलाकार

  • राजस्थानी भाषा संस्थाएँ शिक्षण, शोध, प्रकाशन और संरक्षण के ज़रिए साहित्य को आगे बढ़ाती हैं।
  • राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से पहचानी जाती है।
  • बोरूंदा और रूपायन से जुड़े विजयदान देथा ने राजस्थान के लोक आख्यानों को मुद्रित साहित्य और रंगमंच तक पहुँचाया तथा इस काम के लिए बड़े पुरस्कार पाए।
  • बाड़मेर-जैसलमेर के मांगणियार जैसे मौखिक कलाकार वंशावली, युद्ध-कथा और भक्ति-गीत को पांडुलिपियों से बाहर भी जीवंत रखते हैं।
  • बाड़मेर-जैसलमेर की गीत-परंपरा, बीकानेर का प्रकाशन कार्य और जयपुर-ढूंढाड़ की बोली-स्मृति पांडुलिपियों से बाहर भी इस मानचित्र को जीवंत रखती है।

सांस्कृतिक प्रणाली

  • भाषा, साहित्य और धार्मिक जीवन एक ही सांस्कृतिक प्रणाली बनाते हैं।
  • इसी से समझ में आता है कि राजस्थान की कला-संस्कृति को लिखित और मौखिक खानों में अलग-अलग नहीं बाँटा जा सकता।
  • दरबारी कविता, लोकगीत, संत-वाणी, वंशावली और त्योहारों की प्रस्तुतियाँ अलग-अलग क्षेत्रों, जातियों, दरबारों और जीवित समुदायों में कई सदियों तक राजनीतिक तथा धार्मिक स्मृति को सहेजती रही हैं।

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1MCQराजस्थानी लोकसाहित्य में आड़ी और हियाली किस मौखिक रूप के सबसे निकट हैं?1 अंक · 50 शब्द
  1. Aफड़ कथाचित्र
  2. Bकहावत-संग्रह
  3. Cपहेलियांसही
  4. Dयुद्ध-लोकगीत

व्याख्या

आड़ी और हियाली राजस्थानी लोकसाहित्य की पहेली-शब्दावली में आते हैं। फड़, कहावत और युद्ध-लोकगीत भी वास्तविक सांस्कृतिक रूप हैं, पर वे अलग मौखिक या दृश्य विधाएं हैं।

~50 शब्द · 1 अंक