राजस्थान की जलवायु
मुख्य तथ्य
- राजस्थान की जलवायु पर अरावली की दिशा, भीतर आते-आते कमजोर पड़ता मानसून, मरुस्थलीय शुष्कता और तापमान के बड़े मौसमी अंतर का असर पड़ता है।
- पश्चिमी राजस्थान गर्म मरुस्थलीय से अर्ध-शुष्क है, जबकि दक्षिण-पूर्वी जिले अधिक आर्द्र हैं।
- कोपेन और थॉर्नथ्वेट वर्गीकरण अलग-अलग पद्धतियों से राजस्थान के उसी पूर्व-पश्चिम नमी बदलाव को समझाते हैं।
- फलोदी का 51.0 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड, चूरू का बड़ा तापांतर और लू राजस्थान की गर्मी के प्रमुख स्थान-आधारित तथ्य हैं।
- मावठ पश्चिमी विक्षोभ से शीतकालीन वर्षा है और रबी गेहूं, सरसों तथा चने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
मुख्य बिंदु
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राजस्थान की जलवायु पर अरावली की दिशा, भीतर आते-आते कमजोर पड़ता मानसून, मरुस्थलीय शुष्कता और तापमान के बड़े मौसमी अंतर का असर पड़ता है।
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पश्चिमी राजस्थान गर्म मरुस्थलीय से अर्ध-शुष्क है, जबकि दक्षिण-पूर्वी जिले अधिक आर्द्र हैं।
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कोपेन और थॉर्नथ्वेट वर्गीकरण अलग-अलग पद्धतियों से राजस्थान के उसी पूर्व-पश्चिम नमी बदलाव को समझाते हैं।
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फलोदी का 51.0 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड, चूरू का बड़ा तापांतर और लू राजस्थान की गर्मी के प्रमुख स्थान-आधारित तथ्य हैं।
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मावठ पश्चिमी विक्षोभ से शीतकालीन वर्षा है और रबी गेहूं, सरसों तथा चने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
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अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों शाखाएं राजस्थान को प्रभावित करती हैं, पर कमजोर होकर आती हैं।
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समवर्षा रेखाएं, वर्षा अनिश्चितता और सूखा-प्रवण क्षेत्र पश्चिमी जिलों की संवेदनशीलता समझाते हैं।
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तौक्ते 2021 और राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना जलवायु भूगोल को आपदा अनुकूलन से जोड़ते हैं।
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अरावली राजस्थान की वर्षा को कैसे बाँटती है?
अरावली राजस्थान की वर्षा को इसलिए बाँटती है क्योंकि उसकी दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा अरब सागर शाखा के लगभग समानांतर रहती है और पश्चिमी राजस्थान पर वृष्टि-छाया जैसा प्रभाव बनाती है।
पश्चिमी राजस्थान पर अरावली का वृष्टि-छाया प्रभाव राज्य की जलवायु का संरचनात्मक आधार है। जनगणना 2011 के अनुसार जैसलमेर का जनसंख्या घनत्व केवल 17 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था, जो शुष्क पश्चिम में बसावट की विरलता को समझने में मदद करता है।
संरचनात्मक नियंत्रण
- अरावली की दिशा मोटे तौर पर दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व है।
- यह दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा के लगभग समानांतर रहती है, इसलिए अधिकांश राजस्थान में हवाएं पर्वत से टकराकर तेज़ी से ऊपर नहीं उठतीं।
- गुजरात से भीतर आते हुए नमी कमजोर होती जाती है और पश्चिमी जिले शुष्क रहते हैं।
- दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व में स्थानीय स्थलरूप और मानसूनी पवन-अभिसरण से अधिक वर्षा मिलती है।
- यह केवल पश्चिम मरुस्थल और पूर्व आर्द्र का सरल नियम नहीं है।
- अरावली अक्ष, बालू टीले, समुद्र से दूरी और मानसून का बहाव मिलकर ढाल बनाते हैं।
| भाग | जिले | जलवायु संकेत |
|---|---|---|
| गर्म शुष्क भाग | जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर | पश्चिमी जिले शुष्क रहते हैं |
| अधिक आर्द्र किनारा | उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, कोटा और झालावाड़ | दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व में अधिक वर्षा मिलती है |
50 सेमी समवर्षा रेखा
- 50 सेमी समवर्षा रेखा व्यावहारिक विभाजक की तरह अरावली के साथ चलती है।
- इसके पश्चिम में वर्षा प्रायः 50 सेमी से कम होती है।
- पूर्व, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में वर्षा 50 से 100 सेमी या अधिक होती है।
जलवायु, बसावट और जल भंडारण
- राजस्थान की जलवायु को समझने के लिए अरावली की दिशा, मानसून का व्यवहार, वर्षा का क्रमिक बदलाव और थार की शुष्कता को एक साथ देखना ज़रूरी है।
- यही संरचना बसावट और जल भंडारण को भी प्रभावित करती है।
- पश्चिमी गांव टांकों, बेरियों और गहरे भूजल पर अधिक निर्भर रहते हैं।
- दक्षिण-पूर्व अधिक वनस्पति और मौसमी धाराओं को सहारा देता है।
- इसलिए अरावली को केवल पर्वतमाला की तरह नहीं, बल्कि वर्षा, बसावट और जल-सुरक्षा को दिशा देने वाली जलवायु-रेखा की तरह पढ़ना चाहिए।
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1MCQराजस्थान के मुख्य स्थलरूप अक्ष के पश्चिम में लगातार शुष्कता किस भौतिक नियंत्रण से सबसे अच्छी समझ आती है?
व्याख्या
ख सही है क्योंकि अरावली दिशा अरब सागर शाखा के लिए तीव्र पर्वतीय उठान नहीं बनाती और पश्चिमी जिले शुष्क रहते हैं। क मावठ की शीतकालीन वर्षा है, ग 2021 की दुर्लभ चरम घटना है, और घ स्थानीय ऊंचाई अपवाद है।
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