मुख्य तथ्य

  • अर्थूणा बाँसवाड़ा के निकट वागड़ अंचल का प्राचीन स्थल है, जिसे वागड़-परमारों ने अपनी राजधानी बनाया।
  • अर्थूणा को मंदिर नगरी कहा जाता है क्योंकि यहाँ मण्डलेश्वर शिव मंदिर सहित अनेक मंदिर और परमारकालीन स्थापत्य-अवशेष मिलते हैं।
  • मण्डलेश्वर शिव मंदिर का निर्माण परमार शासक चामुण्डराज ने १०७९ ई. में कराया, जिसका उल्लेख चामुण्डराज के अभिलेख में मिलता है।
  • मण्डलेश्वर शिव मंदिर अर्थूणा में वागड़-परमारों की राजनीतिक शक्ति, मंदिर-निर्माण परंपरा और शिल्प-बोध का प्रमुख प्रमाण है।
  • ११७९ ई. में गुहिल शासक सामंतसिंह ने परमारों से वागड़ छीन लिया, जिससे अर्थूणा पर परमार सत्ता समाप्त हुई और नगर का राजनीतिक महत्व घटा।

मुख्य बिंदु

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    अर्थूणा बाँसवाड़ा के निकट वागड़ अंचल का प्राचीन स्थल है, जिसे वागड़-परमारों ने अपनी राजधानी बनाया।

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    अर्थूणा को मंदिर नगरी कहा जाता है क्योंकि यहाँ मण्डलेश्वर शिव मंदिर सहित अनेक मंदिर और परमारकालीन स्थापत्य-अवशेष मिलते हैं।

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    मण्डलेश्वर शिव मंदिर का निर्माण परमार शासक चामुण्डराज ने १०७९ ई. में कराया, जिसका उल्लेख चामुण्डराज के अभिलेख में मिलता है।

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    मण्डलेश्वर शिव मंदिर अर्थूणा में वागड़-परमारों की राजनीतिक शक्ति, मंदिर-निर्माण परंपरा और शिल्प-बोध का प्रमुख प्रमाण है।

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    ११७९ ई. में गुहिल शासक सामंतसिंह ने परमारों से वागड़ छीन लिया, जिससे अर्थूणा पर परमार सत्ता समाप्त हुई और नगर का राजनीतिक महत्व घटा।

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    अर्थूणा आज भी शिव मंदिर, परमारकालीन स्थापत्य और मूर्तिकला के बिखरे अवशेषों तथा ध्वस्त टीलों के कारण महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर माना जाता है।

अर्थूणा को वागड़ की परमार राजधानी और मंदिर नगरी क्यों कहा जाता है?

अर्थूणा को वागड़ की परमार राजधानी और मंदिर नगरी इसलिए कहा जाता है क्योंकि बाँसवाड़ा के निकट इस प्राचीन स्थल को वागड़-परमारों ने अपनी राजधानी बनाया और यहाँ मण्डलेश्वर शिव मंदिर सहित अनेक मंदिरों तथा परमारकालीन स्थापत्य-अवशेषों की समृद्ध परंपरा मिलती है। अर्थूणा, बाँसवाड़ा के निकट वागड़ अंचल, यानी डूंगरपुर-बाँसवाड़ा भू-भाग, में बसा एक प्राचीन स्थल है, जिसे परमार वंश की वागड़ शाखा ने अपनी राजधानी बनाया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, जोधपुर मंडल के अनुसार चामुण्डराज के अभिलेख में मण्डलेश्वर शिव मंदिर का निर्माण १०७९ ई. में दर्ज है, इसलिए यह तिथि अर्थूणा के परमारकालीन स्थापत्य की ठोस ऐतिहासिक गवाही देती है।

परमार वंशक्रम

  • आदि पुरुष: इस शाखा का आदि पुरुष मालवा के परमार शासक कृष्णराज का द्वितीय पुत्र डम्बरिसिंह माना जाता है।
  • आगे के शासक: धनिक, कंकदेव तथा सत्यराज जैसे शासक हुए।
  • बाद की परंपरा: चामुण्डराज एवं विजयराज ने भी इसी कुल की परंपरा को आगे बढ़ाया।

मण्डलेश्वर शिव मंदिर

  • नगर का सबसे प्रसिद्ध स्मारक: मण्डलेश्वर शिव मंदिर।
  • निर्माण वर्ष: १०७९ ई.
  • निर्माणकर्ता: परमार शासक चामुण्डराज।

मण्डलेश्वर शिव मंदिर अर्थूणा की पहचान का केंद्र है, क्योंकि इसी स्मारक के जरिए वागड़-परमारों की राजनीतिक शक्ति और उनकी मंदिर-निर्माण परंपरा दोनों साथ दिखाई देती हैं। इसे केवल धार्मिक स्थल की तरह नहीं, बल्कि परमारों के राज्य-वैभव, शिल्प-बोध और वागड़ क्षेत्र में उनकी स्थायी उपस्थिति के प्रमाण की तरह पढ़ना चाहिए।

राजनीतिक परिवर्तन

  1. ११७९ ई.: गुहिल शासक सामंतसिंह ने परमारों से वागड़ छीन लिया।
  2. अर्थूणा पर प्रभाव: इस प्रकार अर्थूणा पर परमार सत्ता का अंत हुआ।
  3. इसके पश्चात: नगर का राजनीतिक महत्व क्रमशः घटता गया।

इस राजनीतिक परिवर्तन के बाद अर्थूणा की भूमिका राजधानी के रूप में कमजोर हुई, लेकिन उसके मंदिर और स्थापत्य-अवशेष वागड़ में परमार सत्ता की स्मृति को बचाए रहे। इसलिए अर्थूणा को समझते समय सत्ता-परिवर्तन और सांस्कृतिक धरोहर दोनों को साथ रखना जरूरी है।

बाँसवाड़ा और मंदिर-निर्माण

  • नगर बसाने का श्रेय: बाँसवाड़ा के समीप इस नगर को बसाने का श्रेय इसी वागड़-परमार वंश को दिया जाता है।
  • मंदिर-निर्माण का श्रेय: यहाँ अनेक मंदिरों के निर्माण का श्रेय भी इसी वागड़-परमार वंश को दिया जाता है।
  • शिल्प एवं स्थापत्य: यह शिल्प एवं स्थापत्य के क्षेत्र में उनकी गहरी रुचि का परिचायक है।

बाँसवाड़ा के निकट अर्थूणा का बसना और वहाँ अनेक मंदिरों का निर्माण होना इस बात को स्पष्ट करता है कि वागड़-परमार केवल राजनीतिक शासक नहीं थे; उन्होंने अपने शासन-क्षेत्र में धार्मिक संरचनाओं, मूर्तिकला और स्थापत्य को भी संरक्षण दिया। इसी कारण अर्थूणा को मंदिर नगरी कहा जाना केवल सामान्य प्रशंसा नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक चरित्र का सार है।

पुरातात्विक धरोहर

  • महत्व: आज भी अर्थूणा पुरातात्विक धरोहर के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • विद्यमान मंदिर: गाँव में एक शिव मंदिर अब भी विद्यमान है।
  • परमारकालीन अवशेष: परमारकालीन स्थापत्य एवं मूर्तिकला के अनेक अवशेष आस-पास के खेतों में बिखरे पड़े मिलते हैं।
  • ध्वस्त टीले: अर्थूणा के ध्वस्त टीले वागड़ क्षेत्र में परमारकालीन कला और समृद्धि की कहानी आज भी मूक रूप से कहते हुए प्रतीत होते हैं।

अर्थूणा का परीक्षा-योग्य महत्व इसी जोड़ में है: यह वागड़-परमारों की राजधानी भी था, चामुण्डराज के मण्डलेश्वर शिव मंदिर जैसी ठोस स्थापत्य-स्मृति भी देता है, और परमार सत्ता के अंत के बाद भी अपने मंदिरों, मूर्तियों, बिखरे अवशेषों तथा ध्वस्त टीलों के कारण वागड़ की कला-संपदा का प्रमुख पुरातात्विक स्थल बना रहता है।