लोकवाणी: राजस्थान का प्रथम दैनिक समाचार-पत्र
मुख्य तथ्य
- लोकवाणी राजस्थान से प्रकाशित होने वाला पहला दैनिक समाचार-पत्र माना जाता है।
- सन् 1930 के बाद राजस्थान में पत्रकारिता के नए दौर में लोकवाणी ने दैनिक पत्रकारिता की शुरुआती परंपरा को दिशा दी।
- लोकवाणी रियासती अत्याचारों और जन-आन्दोलनों की खबरों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने वाला सक्रिय मंच था।
- लोकवाणी को रियासती राजस्थान में जनमत निर्माण और राजनीतिक चेतना के माध्यम के रूप में भी याद किया जाता है।
- बी. एल. पानगड़िया लोकवाणी के सम्पादकीय मण्डल में रहे, जिससे इसका उत्तरदायी शासन आन्दोलन से निकट सम्बन्ध स्पष्ट होता है।
मुख्य बिंदु
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लोकवाणी राजस्थान से प्रकाशित होने वाला पहला दैनिक समाचार-पत्र माना जाता है।
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सन् 1930 के बाद राजस्थान में पत्रकारिता के नए दौर में लोकवाणी ने दैनिक पत्रकारिता की शुरुआती परंपरा को दिशा दी।
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लोकवाणी रियासती अत्याचारों और जन-आन्दोलनों की खबरों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने वाला सक्रिय मंच था।
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लोकवाणी को रियासती राजस्थान में जनमत निर्माण और राजनीतिक चेतना के माध्यम के रूप में भी याद किया जाता है।
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बी. एल. पानगड़िया लोकवाणी के सम्पादकीय मण्डल में रहे, जिससे इसका उत्तरदायी शासन आन्दोलन से निकट सम्बन्ध स्पष्ट होता है।
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बीकानेर प्रजामण्डल आन्दोलन के अध्ययन में लोकवाणी के 28 जुलाई, 1946 के अंक को मूल स्रोत के रूप में उद्धृत किया गया है।
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लोकवाणी राजस्थान का पहला दैनिक समाचार-पत्र क्यों माना जाता है?
लोकवाणी राजस्थान का पहला दैनिक समाचार-पत्र माना जाता है, क्योंकि यह प्रदेश से प्रकाशित होने वाला पहला दैनिक पत्र था और रियासती अत्याचारों व जन-आन्दोलनों की खबरों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने वाला सक्रिय मंच बना।
लोकवाणी राजस्थान के पत्रकारिता-इतिहास में विशिष्ट स्थान रखती है, क्योंकि यह प्रदेश से प्रकाशित होने वाला पहला दैनिक समाचार-पत्र था। भारत के प्रेस रजिस्ट्रार जनरल की प्रेस इन इंडिया 2022-23 रिपोर्ट के अनुसार 2022-23 में राजस्थान में 7,800 पंजीकृत पत्र-पत्रिकाएँ थीं; इस बड़े परिदृश्य में लोकवाणी का महत्व इसलिए अलग दिखता है कि उसने राजस्थान में दैनिक पत्रकारिता की शुरुआती परंपरा को दिशा दी।
पत्रकारिता-इतिहास में स्थान
- सन् 1930 के बाद राज्य में पत्रकारिता का नया दौर आरम्भ हुआ।
- इस दौर में नवज्योति, नवजीवन, जयपुर समाचार और त्याग भूमि जैसे अनेक पत्रों के साथ-साथ लोकवाणी का भी प्रकाशन प्रारम्भ हुआ।
- ये पत्र रियासतों में होने वाले अत्याचारों एवं जन-आन्दोलनों की खबरें राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने में निर्णायक भूमिका निभाते थे।
- इसलिए लोकवाणी को केवल एक दैनिक पत्र के रूप में नहीं, बल्कि रियासती राजस्थान में जनमत निर्माण और राजनीतिक चेतना के माध्यम के रूप में भी याद किया जाता है।
सम्पादकीय मण्डल और आन्दोलन-सम्बन्ध
- राजस्थान के स्वाधीनता-संग्राम के प्रसिद्ध इतिहासकार बी. एल. पानगड़िया स्वयं लोकवाणी के सम्पादकीय मण्डल में रहे।
- बी. एल. पानगड़िया मेवाड़ प्रजामण्डल के मुख-पत्र के सम्पादन से भी जुड़े रहे।
- इससे इस अखबार का उत्तरदायी शासन आन्दोलन से निकट का सम्बन्ध स्पष्ट होता है।
- सम्पादकीय मण्डल में ऐसे लोगों की उपस्थिति बताती है कि लोकवाणी की पत्रकारिता केवल समाचार देने तक सीमित नहीं थी; वह रियासतों में उत्तरदायी शासन, नागरिक अधिकारों और जन-आन्दोलन की आवाज़ को संगठित रूप देने से भी जुड़ी हुई थी।
बीकानेर प्रजामण्डल आन्दोलन का स्रोत
- बीकानेर प्रजामण्डल आन्दोलन पर शोध करते समय इतिहासकारों ने लोकवाणी के 28 जुलाई, 1946 के अंक को मूल स्रोत के रूप में उद्धृत किया है।
- इससे यह प्रमाणित होता है कि स्वाधीनता-संग्राम के अंतिम चरण में रियासती जनता की आवाज़ बुलंद करने का यह एक सक्रिय मंच था।
- परीक्षा की दृष्टि से लोकवाणी को याद करते समय तीन बातें साथ रखनी चाहिए: यह राजस्थान का प्रथम दैनिक समाचार-पत्र था, इसका सम्बन्ध उत्तरदायी शासन आन्दोलन और प्रजामण्डल चेतना से जुड़ता है, और इसका 28 जुलाई, 1946 का अंक बीकानेर प्रजामण्डल आन्दोलन के अध्ययन में स्रोत के रूप में उद्धृत हुआ है।
