मुख्य तथ्य

  • अभयविलास जोधपुर के महाराजा अभयसिंह के शासनकाल से जुड़ी डिंगल भाषा की मारवाड़ी दरबारी रचना है।
  • हुकुम चन्द जैन के विवरण के अनुसार अभयविलास की रचना चारण कवि पृथ्वीराज ने की थी।
  • अभयविलास को जोधपुर दरबार की साहित्यिक भाषा, आश्रय-परम्परा, वंश-स्मृति और शौर्य-परम्परा के प्रमाण के रूप में देखा जाता है।
  • महाराजा अभयसिंह के कालखंड में अभयोदय, सूरज प्रकाश और राजरूपक जैसी रचनाएँ भी लिखी गईं, जिससे संस्कृत और डिंगल परम्पराओं का साथ-साथ चलना स्पष्ट होता है।
  • गोपीनाथ शर्मा ने अभयविलास के पत्र ५८ का उपयोग मध्यकालीन राजस्थान के आभूषण-वैभव, जैसे बोर, हाँसली, तुलसी और कर्णफूल, को समझाने में किया है।

मुख्य बिंदु

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    अभयविलास जोधपुर के महाराजा अभयसिंह के शासनकाल से जुड़ी डिंगल भाषा की मारवाड़ी दरबारी रचना है।

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    हुकुम चन्द जैन के विवरण के अनुसार अभयविलास की रचना चारण कवि पृथ्वीराज ने की थी।

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    अभयविलास को जोधपुर दरबार की साहित्यिक भाषा, आश्रय-परम्परा, वंश-स्मृति और शौर्य-परम्परा के प्रमाण के रूप में देखा जाता है।

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    महाराजा अभयसिंह के कालखंड में अभयोदय, सूरज प्रकाश और राजरूपक जैसी रचनाएँ भी लिखी गईं, जिससे संस्कृत और डिंगल परम्पराओं का साथ-साथ चलना स्पष्ट होता है।

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    गोपीनाथ शर्मा ने अभयविलास के पत्र ५८ का उपयोग मध्यकालीन राजस्थान के आभूषण-वैभव, जैसे बोर, हाँसली, तुलसी और कर्णफूल, को समझाने में किया है।

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    अभयविलास के पत्र १९अ का उल्लेख मारवाड़ के संभ्रांत परिवारों की स्त्रियों की अध्ययनरुचि के संदर्भ में किया गया है।

अभयविलास क्या है और महाराजा अभयसिंह के दरबार से उसका क्या संबंध है?

अभयविलास क्या है और महाराजा अभयसिंह के दरबार से उसका क्या संबंध है?

अभयविलास जोधपुर के महाराजा अभयसिंह के शासनकाल से जुड़ी डिंगल भाषा की मारवाड़ी दरबारी रचना है, जिसे हुकुम चन्द जैन के विवरण के अनुसार चारण कवि पृथ्वीराज ने रचा। यह ग्रंथ केवल राज-प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि मारवाड़ के दरबारी साहित्य, वंश-स्मृति, शौर्य-परम्परा, सामाजिक जीवन, आभूषण-वैभव और संभ्रांत स्त्रियों की अध्ययनरुचि समझने के लिए भी उपयोगी स्रोत माना जाता है।

रचनाकार और भाषा

  • हुकुम चन्द जैन के विवरण के अनुसार इसकी रचना चारण कवि पृथ्वीराज ने की।
  • यह रचना डिंगल भाषा में की गई, जो उस युग में दरबारी कवियों की प्रमुख साहित्यिक भाषा थी।
  • इसलिए अभयविलास को पढ़ते समय इसे सामान्य दरबारी प्रशस्ति भर नहीं, बल्कि जोधपुर दरबार की साहित्यिक भाषा और आश्रय-परम्परा के प्रमाण के रूप में देखना चाहिए।

इसी कालखंड की रचनाएँ

रचना रचनाकार विवरण
संस्कृत 'अभयोदय' भट्ट जगजीवन इसी कालखंड में रचा गया
'सूरज प्रकाश' करणीदान इसी कालखंड में रचा गया
'राजरूपक' वीरभाण इसी कालखंड में रचा गया
  • अतः जोधपुर दरबार उस समय वंश-स्मृति, शौर्य और आश्रय-परम्परा का एक स्तरित अभिलेख तैयार कर रहा था।
  • इन समकालीन रचनाओं की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि महाराजा अभयसिंह के दरबार में संस्कृत और डिंगल, दोनों साहित्यिक परम्पराएँ साथ-साथ चल रही थीं।

सामाजिक विवरण और आभूषण-वैभव

  • गोपीनाथ शर्मा के सांस्कृतिक इतिहास में अभयविलास के पत्र ५८ का उद्धरण मध्यकालीन राजस्थान के आभूषण-वैभव को पुनः स्थापित करने में किया गया है।
  • आभूषण-वैभव में बोर, हाँसली, तुलसी, कर्णफूल आदि शामिल हैं।
  • इससे स्पष्ट है कि यह काव्य केवल राज-स्तुति तक सीमित न रहकर सामाजिक विवरणों को भी समेटे हुए था।
  • आभूषणों के ये नाम परीक्षा-उत्तर में इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे दरबार और समाज के वैभव को ठोस वस्तु-संस्कृति के रूप में दिखाते हैं, केवल अमूर्त प्रशंसा के रूप में नहीं।

स्त्री-शिक्षा संबंधी स्रोत-ग्रंथ

  • शर्मा ने इसी ग्रंथ के पत्र १९अ का उल्लेख मारवाड़ के संभ्रांत परिवारों की स्त्रियों की अध्ययनरुचि के संदर्भ में भी किया है।
  • जनगणना २०११ की जोधपुर जिला जनगणना पुस्तिका के अनुसार जिले की साक्षरता दर ६५.९४ प्रतिशत थी, इसलिए पत्र १९अ में दिखने वाली संभ्रांत स्त्री-अध्ययनरुचि को स्थानीय शिक्षा-परिदृश्य के साथ पढ़ना उपयोगी है।
  • अतः अभयविलास स्त्री-शिक्षा संबंधी मध्यकालीन अध्ययनों का भी एक स्रोत-ग्रंथ बन गया।
  • परीक्षा में अभयविलास का महत्व इसी दोहरे कारण से बनता है: यह महाराजा अभयसिंह के दरबार की साहित्यिक संस्कृति भी बताता है और मारवाड़ के सामाजिक जीवन के सूक्ष्म संकेत भी देता है।