मुख्य तथ्य

  • एकलिंग महात्म्य महाराणा कुम्भा के शासनकाल में तैयार संस्कृत ग्रंथ है, जो मेवाड़ के गुहिल शासकों की वंश-परम्परा, दरबारी विद्या-संस्कृति और भौतिक संस्कृ...
  • इस ग्रंथ के कर्तृत्व पर एक मत महाराणा कुम्भा को रचयिता मानता है, जबकि दूसरा मत दरबारी कवि कान्ह व्यास को वास्तविक लेखक बताता है।
  • एकलिंग महात्म्य मेवाड़ के गुहिल शासकों की वंश-परम्परा सुरक्षित रखता है और तत्कालीन सामाजिक संगठन की झलक देता है।
  • कुम्भलगढ़ प्रशस्ति के साथ पढ़ने पर यह ग्रंथ मेवाड़ के गुहिलों को आनंदपुर के ब्राह्मण कुल से जोड़ने वाले मत को बल देता है।
  • ग्रंथ से परवर्ती इतिहासकारों को कुम्भा की वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद्, व्याकरण और राजनीति-शास्त्र में रुचि का संकेत मिलता है।

मुख्य बिंदु

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    एकलिंग महात्म्य महाराणा कुम्भा के शासनकाल में तैयार संस्कृत ग्रंथ है, जो मेवाड़ के गुहिल शासकों की वंश-परम्परा, दरबारी विद्या-संस्कृति और भौतिक संस्कृति के अध्ययन का महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत है।

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    इस ग्रंथ के कर्तृत्व पर एक मत महाराणा कुम्भा को रचयिता मानता है, जबकि दूसरा मत दरबारी कवि कान्ह व्यास को वास्तविक लेखक बताता है।

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    एकलिंग महात्म्य मेवाड़ के गुहिल शासकों की वंश-परम्परा सुरक्षित रखता है और तत्कालीन सामाजिक संगठन की झलक देता है।

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    कुम्भलगढ़ प्रशस्ति के साथ पढ़ने पर यह ग्रंथ मेवाड़ के गुहिलों को आनंदपुर के ब्राह्मण कुल से जोड़ने वाले मत को बल देता है।

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    ग्रंथ से परवर्ती इतिहासकारों को कुम्भा की वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद्, व्याकरण और राजनीति-शास्त्र में रुचि का संकेत मिलता है।

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    संस्कृति-इतिहास में इसका उपयोग पुरुष-परिधान के पुनर्निर्माण और स्त्री-आभूषणों की शब्दावली समझने के संदर्भ में किया गया है।

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एकलिंग महात्म्य क्या है और मेवाड़ के इतिहास में क्यों महत्वपूर्ण है?

एकलिंग महात्म्य महाराणा कुम्भा के शासनकाल में तैयार संस्कृत ग्रंथ है, जो मेवाड़ के गुहिल शासकों की वंश-परम्परा, कुम्भा-कालीन दरबारी विद्या-संस्कृति और भौतिक संस्कृति को समझने के लिए महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत माना जाता है।

एकलिंग महात्म्य: कुम्भा-कालीन मेवाड़ का संस्कृत ग्रंथ

एकलिंग महात्म्य महाराणा कुम्भा (1433-1468 ई.) के शासनकाल का संस्कृत ग्रंथ है।

राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार कुम्भलगढ़ किले की विशाल दीवार लगभग 36 किमी तक फैली है; इसी कुम्भा-कालीन मेवाड़ में दुर्ग-निर्माण, प्रशस्ति-साहित्य और संस्कृत ग्रंथ-परम्परा को साथ पढ़ना उपयोगी रहता है।

कर्तृत्व पर परम्पराएँ

हुकुम चन्द्र जैन इसके कर्तृत्व पर दो परम्पराओं की ओर संकेत करते हैं:

  • एक मत स्वयं महाराणा कुम्भा को इसका रचयिता मानता है।
  • दूसरा मत कुम्भा की विद्वत्ता का परिचय देने वाले श्लोक के आधार पर दरबारी कवि कान्ह व्यास को इसका वास्तविक लेखक बताता है, जिन्होंने महाराणा के संरक्षण में यह कृति तैयार की।

साहित्यिक स्रोत के रूप में महत्व

साहित्यिक स्रोत के रूप में इसका महत्व दो दिशाओं में है:

1. प्रथमतः, यह मेवाड़ के गुहिल शासकों की वंश-परम्परा सुरक्षित रखता है तथा तत्कालीन सामाजिक संगठन की झलक प्रस्तुत करता है।

2. दूसरी बात यह कि 1460 ई. की कुम्भलगढ़ प्रशस्ति के साथ पढ़ने पर यह उस मत को बल देता है जिसे डी. आर. भण्डारकर ने आहड़ के अभिलेख के आधार पर रखा था — अर्थात् मेवाड़ के गुहिल आनंदपुर के ब्राह्मण कुल से निकले थे; यह कर्नल टॉड तथा कविराजा श्यामलदास द्वारा प्रस्तुत वल्लभी-मूल वाली परिकल्पना का प्रतिवाद करता है।

कुम्भा की विद्वत्ता और दरबारी बौद्धिक संस्कृति

इसी ग्रंथ से परवर्ती इतिहासकारों को यह भी ज्ञात होता है कि स्वयं कुम्भा इन विषयों के अध्येता थे:

  • वेद
  • स्मृति
  • मीमांसा
  • उपनिषद्
  • व्याकरण
  • राजनीति-शास्त्र

यह उनके दरबार की बौद्धिक संस्कृति को समझने में सहायक विवरण है।

संस्कृति-इतिहास में उपयोग

संस्कृति-इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा ने अपने ग्रंथ में इन संदर्भों का उल्लेख किया है:

संदर्भउपयोग
श्लोक 22 (पत्र 20)गुप्तोत्तर काल से पन्द्रहवीं शताब्दी तक के पुरुष-परिधान के पुनर्निर्माण में
पत्र 21स्त्री-आभूषणों की शब्दावली के संदर्भ में

परीक्षा-दृष्टि से स्मरण

अतः परीक्षा-दृष्टि से यह कृति इन तीनों के संधि-स्थल पर खड़ी है:

  • वंश-स्मृति
  • दरबारी विद्या-संस्कृति
  • भौतिक संस्कृति

इसे राजवल्लभ तथा संगीतराज जैसी कुम्भा-कालीन रचनाओं के साथ स्मरण करना उपयोगी रहता है।