मुख्य तथ्य

  • अमरसार सोलहवीं शताब्दी का संस्कृत ऐतिहासिक काव्य है, जिसकी रचना मेवाड़ दरबार के आश्रित कवि पंडित जीवधर ने की थी।
  • इस ग्रंथ में महाराणा प्रताप और अमरसिंह प्रथम के समय के मेवाड़ का राजनीतिक, दरबारी और सामाजिक जीवन मिलता है।
  • अमरसार सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक मेवाड़ इतिहास का प्रमुख साहित्यिक स्रोत माना जाता है।
  • इस काव्य में रहन-सहन, आमोद-प्रमोद और मेवाड़ी उच्च वर्ग की दिनचर्या का सजीव वर्णन मिलता है।
  • गोपीनाथ शर्मा ने अमरसार को राजविनोद के साथ मध्ययुगीन राजस्थान की उच्च वर्गीय भोजन-संस्कृति का प्रमाण माना है।

मुख्य बिंदु

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    अमरसार सोलहवीं शताब्दी का संस्कृत ऐतिहासिक काव्य है, जिसकी रचना मेवाड़ दरबार के आश्रित कवि पंडित जीवधर ने की थी।

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    इस ग्रंथ में महाराणा प्रताप और अमरसिंह प्रथम के समय के मेवाड़ का राजनीतिक, दरबारी और सामाजिक जीवन मिलता है।

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    अमरसार सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक मेवाड़ इतिहास का प्रमुख साहित्यिक स्रोत माना जाता है।

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    इस काव्य में रहन-सहन, आमोद-प्रमोद और मेवाड़ी उच्च वर्ग की दिनचर्या का सजीव वर्णन मिलता है।

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    गोपीनाथ शर्मा ने अमरसार को राजविनोद के साथ मध्ययुगीन राजस्थान की उच्च वर्गीय भोजन-संस्कृति का प्रमाण माना है।

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    अमरसार में गेहूँ, चना और दालों से बने हलुवा, फैनी, घेवर, खाजा और लड्डू जैसी मिष्ठान सामग्री का उल्लेख उच्च वर्गीय रसोई और स्वाद-संस्कृति की झलक देता है।

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अमरसार क्या है और मेवाड़ के इतिहास में इसका महत्व क्यों है?

अमरसार सोलहवीं शताब्दी का संस्कृत ऐतिहासिक काव्य है, जिसे मेवाड़ दरबार के आश्रित कवि पंडित जीवधर ने रचा और जिसमें महाराणा प्रताप तथा अमरसिंह प्रथम के समय के मेवाड़ का राजनीतिक, दरबारी और सामाजिक जीवन मिलता है।

अमरसार सोलहवीं शताब्दी में रचित एक संस्कृत ऐतिहासिक काव्य है, जिसके रचयिता मेवाड़ दरबार के आश्रित कवि पंडित जीवधर थे। राजस्थान लोक सेवा आयोग के RAS प्रारंभिक पाठ्यक्रम में सामान्य ज्ञान और सामान्य विज्ञान का प्रश्नपत्र 200 अंकों का है, और उसी पाठ्यक्रम में राजस्थान की भाषा तथा साहित्य को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है; इसलिए अमरसार जैसे ग्रंथ परीक्षा में केवल साहित्यिक नाम नहीं, बल्कि इतिहास-स्रोत के रूप में भी पढ़े जाते हैं।

ऐतिहासिक महत्त्व

  • यह ग्रंथ महाराणा प्रताप तथा उनके उत्तराधिकारी अमरसिंह प्रथम के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत करता है।
  • अतः सोलहवीं के उत्तरार्ध तथा सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक मेवाड़ इतिहास का यह एक प्रमुख साहित्यिक स्रोत माना जाता है।
  • इस प्रकार प्रताप-अमरसिंह युग की राजनीतिक प्रशस्तियों के साथ-साथ अमरसार दरबारी जीवनशैली की दुर्लभ झाँकी भी सुरक्षित रखता है।
  • परीक्षा की दृष्टि से इसका महत्व यही है कि यह राजवंशीय घटनाओं को केवल नाम-क्रम की तरह नहीं रखता, बल्कि मेवाड़ दरबार के वातावरण, उच्च वर्ग के व्यवहार और तत्कालीन सांस्कृतिक संकेतों को भी जोड़ता है।

सामाजिक जीवन का चित्रण

राजवंशीय विवरण से परे, इस काव्य की विशेष ख्याति तत्कालीन सामाजिक जीवन के चित्रण के लिए है:

  • रहन-सहन।
  • आमोद-प्रमोद।
  • मेवाड़ी उच्च वर्ग की दिनचर्या का सजीव वर्णन।

इन बिंदुओं के कारण अमरसार को केवल प्रशस्ति-काव्य मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। यह ग्रंथ बताता है कि मेवाड़ के उच्च वर्ग में जीवन-शैली, मनोरंजन और दरबारी दिनचर्या किस तरह संस्कृति और सत्ता, दोनों से जुड़ी हुई थी।

भोजन-संस्कृति का प्रमाण

गोपीनाथ शर्मा अपने राजस्थानी सांस्कृतिक इतिहास में अमरसार को (राजविनोद के साथ) मध्ययुगीन राजस्थान की उच्च वर्गीय भोजन-संस्कृति का प्रमाण मानते हैं।

स्रोत-संदर्भप्रमाणित पक्षविवरण
गोपीनाथ शर्मा का राजस्थानी सांस्कृतिक इतिहासमध्ययुगीन राजस्थान की उच्च वर्गीय भोजन-संस्कृतिअमरसार को राजविनोद के साथ प्रमाण माना गया
तत्कालीन उच्च वर्गीय रसोइयाँमिष्ठान सामग्रीगेहूँ, चना तथा दालों से निर्मित हलुवा, फैनी, घेवर, खाजा एवं लड्डू जैसी मिष्ठान सामग्री बनाई जाती थी

इस भोजन-संस्कृति वाले प्रमाण से अमरसार की उपयोगिता और बढ़ जाती है, क्योंकि मध्ययुगीन राजस्थान के उच्च वर्गीय खान-पान पर सीधे संकेत देने वाले साहित्यिक स्रोत कम हैं। गेहूँ, चना तथा दालों से बने हलुवा, फैनी, घेवर, खाजा एवं लड्डू जैसे मिष्ठान केवल भोजन की सूची नहीं हैं, बल्कि वे उस समय की रसोई, संपन्नता और स्वाद-संस्कृति की झलक भी देते हैं।

मानक सन्दर्भ बिंदु

  • आधुनिक इतिहासकार इन सामाजिक विवरणों के लिए मूलतः पद्य 345 से 351 तथा पत्र 30 का सन्दर्भ देते हैं।

इन पद्य 345 से 351 तथा पत्र 30 को याद रखने से उत्तर में सटीकता आती है। अमरसार पर लिखते समय पंडित जीवधर, महाराणा प्रताप, अमरसिंह प्रथम, सामाजिक जीवन, आमोद-प्रमोद, उच्च वर्गीय दिनचर्या और भोजन-संस्कृति को साथ जोड़ना चाहिए; यही इसे सोलहवीं शताब्दी के मेवाड़-दरबारी काव्य के रूप में उपयोगी बनाता है।