सिकन्दर का आक्रमण (327 ई.पू.) और राजस्थान में गणजातियों का प्रवास
मुख्य तथ्य
- सिकन्दर के 327 ई.पू. के आक्रमण के बाद मालव, शिवि, आर्जुनायन और यौधेय गणजातियाँ उत्तर-पश्चिम भारत से दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़कर आज के राजस्थान में नए रा...
- शिवि कुल चित्तौड़ के भू-भाग से जुड़ा था और मध्यमिका उनका सांस्कृतिक केन्द्र माना गया।
- मालव पहले जयपुर संभाग के बागड़ और नगर में दिखते हैं और बाद में टोंक, अजमेर तथा मेवाड़ तक अपना प्रभुत्व बढ़ाते हैं।
- आर्जुनायन भरतपुर-अलवर क्षेत्र से जुड़े थे, जबकि यौधेय बीकानेर सहित उत्तरी राजस्थान को संगठित करने वाली शक्ति के रूप में सामने आते हैं।
- सूरतगढ़ के निकट रंगमहल कभी यौधेय गणराज्य की राजधानी था और सिकन्दर के पश्चिमी अभियान तथा बाद के हूण आक्रमणों से जुड़े सत्ता-परिवर्तन का उदाहरण है।
मुख्य बिंदु
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सिकन्दर के 327 ई.पू. के आक्रमण के बाद मालव, शिवि, आर्जुनायन और यौधेय गणजातियाँ उत्तर-पश्चिम भारत से दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़कर आज के राजस्थान में नए राज्य बसाने लगीं।
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शिवि कुल चित्तौड़ के भू-भाग से जुड़ा था और मध्यमिका उनका सांस्कृतिक केन्द्र माना गया।
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मालव पहले जयपुर संभाग के बागड़ और नगर में दिखते हैं और बाद में टोंक, अजमेर तथा मेवाड़ तक अपना प्रभुत्व बढ़ाते हैं।
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आर्जुनायन भरतपुर-अलवर क्षेत्र से जुड़े थे, जबकि यौधेय बीकानेर सहित उत्तरी राजस्थान को संगठित करने वाली शक्ति के रूप में सामने आते हैं।
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सूरतगढ़ के निकट रंगमहल कभी यौधेय गणराज्य की राजधानी था और सिकन्दर के पश्चिमी अभियान तथा बाद के हूण आक्रमणों से जुड़े सत्ता-परिवर्तन का उदाहरण है।
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मालवानांजय और अर्जुनायनांजय लेख वाले सिक्के बताते हैं कि लगभग 130 ई.पू. से 400 ई. तक मालव और आर्जुनायन गणराज्य स्वतंत्र राजनीतिक पहचान रखते थे।
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सिकन्दर के आक्रमण के बाद राजस्थान में कौन-सी गणजातियाँ आईं?
सिकन्दर के 327 ई.पू. के आक्रमण के बाद मालव, शिवि, आर्जुनायन और यौधेय गणजातियाँ उत्तर-पश्चिम भारत से दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ीं और आज के राजस्थान में नए राज्य बसाने लगीं। मकदूनिया के सिकन्दर ने 327 ई.पू. में पंजाब पर हमला किया, जिसके फलस्वरूप उत्तर-पश्चिम भारत की कई गणजातियाँ अपनी स्वतंत्रता बचाने के लिए दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ चलीं। राजस्थान लोक सेवा आयोग के RAS प्रारम्भिक परीक्षा पाठ्यक्रम के अनुसार सामान्य ज्ञान और सामान्य विज्ञान का प्रश्नपत्र 200 अंकों का है, और उसी पाठ्यक्रम में प्राचीन राजस्थान के समाज, धर्म और संस्कृति को अलग से पढ़ा जाता है।
आज के राजस्थान में नए राज्य
मालव, शिवि, आर्जुनायन तथा यौधेय गण आज के राजस्थान में पहुँचे और यहाँ नए राज्य बसाए। इन गणजातियों का महत्व केवल प्रवास तक सीमित नहीं था; इन्होंने चित्तौड़, मेवाड़, टोंक, अजमेर, भरतपुर, अलवर, बीकानेर और उत्तरी राजस्थान के कई क्षेत्रों में प्राचीन राजनीतिक संगठन की नई रेखाएँ खड़ी कीं। शिवि कुल के लिए चित्तौड़ का भू-भाग और मध्यमिका सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में याद रखे जाते हैं, जबकि मालव पहले जयपुर संभाग के बागड़ और नगर में दिखते हैं और बाद में टोंक, अजमेर तथा मेवाड़ तक अपना प्रभुत्व बढ़ाते हैं। आर्जुनायन भरतपुर–अलवर क्षेत्र से जुड़े थे और यौधेय बीकानेर सहित उत्तरी राजस्थान को संगठित करने वाली शक्ति के रूप में सामने आते हैं।
| गण | क्षेत्र | विवरण |
|---|---|---|
| शिवि कुल | चित्तौड़ का भू-भाग | मध्यमिका उनका सांस्कृतिक केन्द्र बना |
| मालवों | पहले जयपुर संभाग के बागड़ और नगर | फिर टोंक, अजमेर तथा मेवाड़ तक प्रभुत्व बढ़ाया |
| आर्जुनायनों | भरतपुर–अलवर क्षेत्र | भरतपुर–अलवर क्षेत्र सम्भाला |
| यौधेयों | बीकानेर सहित उत्तरी राजस्थान | उत्तरी राजस्थान को संगठित किया |
रंगमहल
- सूरतगढ़ के निकट स्थित रंगमहल, जो कभी यौधेय गणराज्य की राजधानी था, सिकन्दर के पश्चिमी अभियान में क्षतिग्रस्त हुआ और बाद में हूण आक्रमणों से पूरी तरह नष्ट हो गया। इस संदर्भ में रंगमहल को उत्तरी राजस्थान में यौधेय उपस्थिति और बाद के आक्रमणों से जुड़े सत्ता-परिवर्तन की कड़ी के रूप में पढ़ना चाहिए। परीक्षा में इसे केवल पुरातात्त्विक स्थल की तरह नहीं, बल्कि यौधेय गणराज्य, उत्तरी राजस्थान और बाहरी आक्रमणों के प्रभाव को जोड़ने वाले उदाहरण की तरह पढ़ना चाहिए।
सिक्के
- मालवानांजय तथा अर्जुनायनांजय लेख वाले सिक्के दर्शाते हैं कि लगभग 130 ई.पू. से 400 ई. तक ये गणराज्य स्वतंत्र बने रहे। इन सिक्कों से यह भी स्पष्ट होता है कि मालव और आर्जुनायन केवल प्रवासी समूह नहीं रहे, बल्कि अपने नाम से राजनीतिक पहचान और स्वतंत्र सत्ता का दावा करने वाले गणराज्य थे। इसलिए सिक्के यहाँ राजनीतिक प्रमाण के रूप में महत्वपूर्ण हैं: वे गणों के नाम, उनकी स्वतंत्रता और राजस्थान में उनके स्थायी प्रभाव को एक साथ दिखाते हैं।
