मुख्य तथ्य

  • औपनिवेशिक काल की राजस्थान रियासतों में पृथ्वीसिंह नाम से बाँसवाड़ा, झालावाड़ और मेवाड़ के बिजौलिया ठिकाने से जुड़े तीन अलग-अलग शासकीय व्यक्तित्व मिलते…
  • बाँसवाड़ा के महारावल पृथ्वीसिंह ने मेयो कॉलेज से शिक्षा ली और युवराज रहते हुए रियासती सैन्य-दस्ते के साथ मानगढ़ की पहाड़ियों तक पहुँचकर भील समाज-सुधार…
  • बाँसवाड़ा के महारावल पृथ्वीसिंह ने शासक बनने के बाद रियासत के कई भवनों के नाम ब्रिटिश राजपरिवार और वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारियों पर रखे।
  • १८५७ के विप्लव के समय झालावाड़ के पृथ्वीसिंह अंग्रेजों के समर्थक रहे और क्रांतिकारियों की धरपकड़ में सहायता करने वालों के लिए नकद पुरस्कारों का सार्वज…
  • बिजौलिया ठिकाने में १९०६ ई. में उत्तराधिकारी बने पृथ्वीसिंह ने तलवार-बधाई की रकम के लिए लगान बढ़ाया और तलवार-बन्दी की नई लागत किसानों पर थोप दी, जिसके…

मुख्य बिंदु

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    औपनिवेशिक काल की राजस्थान रियासतों में पृथ्वीसिंह नाम से बाँसवाड़ा, झालावाड़ और मेवाड़ के बिजौलिया ठिकाने से जुड़े तीन अलग-अलग शासकीय व्यक्तित्व मिलते हैं।

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    बाँसवाड़ा के महारावल पृथ्वीसिंह ने मेयो कॉलेज से शिक्षा ली और युवराज रहते हुए रियासती सैन्य-दस्ते के साथ मानगढ़ की पहाड़ियों तक पहुँचकर भील समाज-सुधारक गोविन्द गुरु को बंदी बनाया।

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    बाँसवाड़ा के महारावल पृथ्वीसिंह ने शासक बनने के बाद रियासत के कई भवनों के नाम ब्रिटिश राजपरिवार और वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारियों पर रखे।

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    १८५७ के विप्लव के समय झालावाड़ के पृथ्वीसिंह अंग्रेजों के समर्थक रहे और क्रांतिकारियों की धरपकड़ में सहायता करने वालों के लिए नकद पुरस्कारों का सार्वजनिक ऐलान करवाया।

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    बिजौलिया ठिकाने में १९०६ ई. में उत्तराधिकारी बने पृथ्वीसिंह ने तलवार-बधाई की रकम के लिए लगान बढ़ाया और तलवार-बन्दी की नई लागत किसानों पर थोप दी, जिसके विरोध में १९१३ ई. में किसानों ने भूमि-कर देना बंद किया।

औपनिवेशिक काल की राजस्थान रियासतों में पृथ्वीसिंह नाम के तीन शासक कौन थे?

औपनिवेशिक काल की राजस्थान रियासतों में पृथ्वीसिंह नाम से याद किए जाने वाले तीन अलग-अलग शासकीय व्यक्तित्व थे: बाँसवाड़ा के महारावल पृथ्वीसिंह, झालावाड़ के पृथ्वीसिंह और मेवाड़ के बिजौलिया ठिकाने के पृथ्वीसिंह। राजस्थान की उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की आरंभिक रियासती सूची में पृथ्वीसिंह नाम के तीन अलग-अलग शासक मिलते हैं, जिन्हें अभ्यर्थी प्रायः एक मान बैठते हैं। इसलिए परीक्षा में नाम समान दिखे तो रियासत, काल और प्रसंग को साथ पढ़ना जरूरी है। बाँसवाड़ा वाले प्रसंग में भील समाज की पृष्ठभूमि समझना उपयोगी है; जनगणना २०११ के प्राथमिक जनगणना सार के अनुसार बाँसवाड़ा जिले में अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी ७६.४ प्रतिशत थी।

पृथ्वीसिंह काल/संदर्भ मुख्य तथ्य
बाँसवाड़ा के महारावल पृथ्वीसिंह १९१३-१९४४ ई. उन्होंने मेयो कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की थी; युवराज पद पर रहते हुए वे रियासती सैन्य-दस्ते का नेतृत्व करते हुए मानगढ़ की पहाड़ियों तक पहुँचे और भील समाज-सुधारक गोविन्द गुरु को बंदी बनाया। शासक बनने पर उन्होंने रियासत के अनेक भवनों के नाम ब्रिटिश राजपरिवार तथा वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारियों पर रखे।
झालावाड़ के पृथ्वीसिंह १८५७ के विप्लव के समय वे अंग्रेजों के समर्थक बने रहे; उन्होंने क्रांतिकारियों की धरपकड़ में सहायता करने वाले व्यक्तियों के लिए नकद पुरस्कारों का सार्वजनिक ऐलान करवाया और दिल्ली पर अंग्रेजी नियंत्रण पुनः स्थापित होते ही ए.जी.जी. को बधाई-संदेश भेजा।
मेवाड़ के बिजौलिया ठिकाने में पृथ्वीसिंह राव कृष्णसिंह की मृत्यु के बाद १९०६ ई. में उत्तराधिकारी बने तलवार-बधाई की रकम जुटाने के लिए उन्होंने एक तरफ लगान बढ़ाया तो दूसरी तरफ 'तलवार-बन्दी' की नई लागत किसानों पर थोप दी। इसके विरोध में साधु सीतारामदास, फतहकरण चारण तथा ब्रह्मदेव के नेतृत्व में १९१३ ई. में किसानों ने ऊपरमाल के खेत पड़त रखकर भूमि-कर देना बंद कर दिया। पृथ्वीसिंह की शीघ्र मृत्यु के बाद नाबालिग पुत्र केसरसिंह की ओर से मेवाड़ सरकार ने कोर्ट ऑफ वार्ड्स लागू कर दिया।

बाँसवाड़ा में नामकरण के उदाहरण

  • किंग जॉर्ज फिफ्थ स्कूल
  • एडवर्ड धर्मशाला
  • कागदी नदी पर बना वाइली ब्रिज: जो हत्या के शिकार ब्रिटिश राजनीतिक अधिकारी कर्जन वाइली की स्मृति में था।