मुख्य तथ्य

  • गुटीय रिक्तता का लाभ उठाकर महादजी सिंधिया के नायब अम्बाजी इंगले ने 16 अप्रैल, 1791 के समझौते के अधीन चूण्डावतों से 64 लाख रुपए वसूले।
  • वसूले गए 64 लाख रुपए में से 48 लाख महादजी ने अपने पास रख लिए।
  • इसी गुटबाजी ने पिंडारी अमीर खाँ को मेवाड़ की राजनीति में पैर जमाने का अवसर दिया और 13 जनवरी, 1818 की अंग्रेज़-संधि से यह दौर समाप्त हुआ।

मुख्य बिंदु

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    शक्तावत मेवाड़ की सिसोदिया कुलीनता के दो प्रमुख जागीरदार-गुटों में से एक थे, जिनकी चूण्डावत सरदारों से हरावल नेतृत्व और दरबारी प्रभाव को लेकर पुश्तैनी प्रतिद्वन्द्विता थी।

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    शक्तावतों और चूण्डावतों की आपसी फूट महाराणा भीमसिंह के काल में चरम पर पहुँची और मेवाड़ दरबार बँट गया।

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    चूण्डावत मराठों को मेवाड़ से बाहर निकालने के पक्षधर थे, लेकिन शक्तावतों के अड़ंगे से महाराणा अपने जागीरदारों के सामने असहाय हो गए।

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    गुटीय रिक्तता का लाभ उठाकर महादजी सिंधिया के नायब अम्बाजी इंगले ने 16 अप्रैल, 1791 के समझौते के अधीन चूण्डावतों से 64 लाख रुपए वसूले।

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    वसूले गए 64 लाख रुपए में से 48 लाख महादजी ने अपने पास रख लिए।

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    इसी गुटबाजी ने पिंडारी अमीर खाँ को मेवाड़ की राजनीति में पैर जमाने का अवसर दिया और 13 जनवरी, 1818 की अंग्रेज़-संधि से यह दौर समाप्त हुआ।

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शक्तावत कौन थे और मेवाड़ में उनकी चूण्डावतों से प्रतिद्वन्द्विता क्यों महत्वपूर्ण थी?

शक्तावत मेवाड़ की सिसोदिया कुलीनता के दो प्रमुख जागीरदार-गुटों में से एक थे, जिनकी चूण्डावत सरदारों से हरावल नेतृत्व और दरबारी प्रभाव को लेकर पुश्तैनी प्रतिद्वन्द्विता ने मेवाड़ की राजनीति को भीतर से कमजोर किया और बाहरी हस्तक्षेप का रास्ता खोला। शक्तावत मेवाड़ की सिसोदिया कुलीनता के दो प्रमुख जागीरदार-गुटों में से एक थे और सेना के हरावल में नेतृत्व के अधिकार को लेकर प्रतिद्वन्द्वी चूण्डावत सरदारों से उनकी पुश्तैनी कलह चली आ रही थी। जनगणना 2011 की उदयपुर जिला जनगणना पुस्तिका के अनुसार उदयपुर जिला राजस्थान में जनसंख्या के आधार पर 5वें स्थान पर था, इसलिए मेवाड़ की राजधानी और उसके जागीरदार-गुटों की राजनीति को राजस्थान के बड़े क्षेत्रीय शक्ति-केंद्र के संदर्भ में पढ़ना चाहिए।

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+#### गुटीय प्रतिद्वन्द्विता

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+- यह आपसी फूट महाराणा भीमसिंह (1778–1828 ई.) के काल में चरम पर पहुँची।

+- चूण्डावत मराठों को मेवाड़ से बाहर निकालने के पक्षधर थे।

+- शक्तावतों के अड़ंगे से दरबार बँट गया और महाराणा अपने ही जागीरदारों के सामने असहाय हो गए।

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+#### समझौता और वसूली

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+- इस रिक्तता का लाभ उठाकर महादजी सिंधिया के नायब अम्बाजी इंगले ने 16 अप्रैल, 1791 के समझौते के अधीन चूण्डावतों से 64 लाख रुपए वसूले।

+- इनमें से 48 लाख महादजी ने अपने पास रख लिए।

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+#### आगे का परिणाम

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+- आगे चलकर इसी गुटबाजी ने पिंडारी अमीर खाँ को मेवाड़ की राजनीति में पैर जमाने का अवसर दिया।

+- यह राजकुमारी कृष्णा कुमारी के 21 जुलाई, 1810 को विषपान कर प्राण देने की पृष्ठभूमि बनी।

+- अन्ततः 13 जनवरी, 1818 की अंग्रेज़-संधि से यह दौर समाप्त हुआ।