राजस्व एवं प्रशासनिक व्यवस्थाएँ तथा उनके बदलते स्वरूप
मुख्य तथ्य
- अकबर की दहसाला व्यवस्था (1580 ई.) — 10 वर्षों की औसत उपज — राजपूताना में मुगल अधीनता वाले राज्यों में अपनाई गई
- कर्नल जेम्स टॉड की 'एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' (1829, 1832) — राजपूत राजस्व रीतियों और जागीरदारी का प्रथम व्यवस्थित दस्तावेज
- ब्रिटिश प्रभुसत्ता ने 1870 के दशक से राजपूताना में बंदोबस्त कार्य प्रारंभ किए — रीति-आधारित आकलन की जगह लिखित सर्वेक्षण लाए
- राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम, 1952 ने 16,000 से अधिक जागीरें समाप्त कीं — किसानों को काश्तकारी अधिकार दिए गए
- फरवरी 2026 में राजस्थान सरकार ने 3 ऐतिहासिक स्थानों के नाम बदलने की घोषणा की — माउंट आबू का नया नाम आबूराज — कामां का नया नाम कामवन
मुख्य बिंदु
- 1
राजपूत-काल के राजस्थान में त्रिस्तरीय भूमि व्यवस्था थी
- जागीर — सैनिक सेवा के बदले सामंतों को दी गई भूमि
- खालसा — राज्य की सीधी प्रशासित भूमि
- भोम — भोमिया राजपूतों की वंशानुगत ग्राम भूमि
- 2
मारवाड़ में रेख राजस्व आकलन की मानक इकाई थी
- प्रत्येक गाँव की एक निश्चित रेख निर्धारित होती थी
- हासिल वास्तव में वसूला गया राजस्व था
- दोनों के बीच का अंतर प्रशासनिक दक्षता का माप था
- 3
अकबर की दहसाला व्यवस्था (1580 ई.) — 10 वर्षों की औसत उपज
- राजपूताना में मुगल अधीनता वाले राज्यों में अपनाई गई
- जब्त (फसल माप) पूर्वी राजस्थान में लागू हुई
- टोडर मल ने इसे अजमेर सूबे में लागू किया
- 4
जागीरदारों द्वारा निम्न जातियों और आदिवासियों से बिना पारिश्रमिक के ली जाने वाली श्रम सेवा
- खेती, ढुलाई और घरेलू काम सभी में जबरी श्रम
- राजस्थान की सामंती व्यवस्था की सर्वाधिक शोषणकारी विशेषता
- बिजोलिया, बेगूँ और एकी आंदोलनों का प्रत्यक्ष कारण
- 5
राजपूत राज्य में पाँच-स्तरीय प्रशासनिक पदानुक्रम
- दीवान → फौजदार → हाकिम → पटवारी → चौधरी
- प्रत्येक स्तर अपने से ऊपर वाले को जवाबदेह था
- ग्राम-स्तर तक कर वसूली और प्रशासन सुनिश्चित होता था
- 6
कर्नल जेम्स टॉड की 'एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' (1829, 1832)
- राजपूत राजस्व रीतियों और जागीरदारी का प्रथम व्यवस्थित दस्तावेज
- टॉड पश्चिमी राजपूताना के राजनीतिक एजेंट थे (1818–22)
- राजस्थान लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए अनिवार्य प्राथमिक स्रोत
- 7
ब्रिटिश प्रभुसत्ता ने 1870 के दशक से राजपूताना में बंदोबस्त कार्य प्रारंभ किए
- रीति-आधारित आकलन की जगह लिखित सर्वेक्षण लाए
- मारवाड़ का प्रथम नियमित बंदोबस्त ए.पी. निकोलसन (1891–95) ने किया
- ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों की पद्धति पर आधारित
- 8
कोटवाल राजपूत-कालीन राजधानियों और बाजार कस्बों का नगर प्रशासक
- पुलिसिंग और नाप-तौल नियमन का प्रभारी
- हाट में बाज़ार कर वसूल करता था
- फौजदार का नगरीय समकक्ष
- 9
राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम, 1952 ने 16,000 से अधिक जागीरें समाप्त कीं
- किसानों को काश्तकारी अधिकार दिए गए — राज्य के प्रत्यक्ष अधीन
- राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 ने सभी क्षेत्रों में एकसमान ढाँचा बनाया
- मारवाड़ राजस्व एवं काश्तकारी अधिनियम, 1949 इसका पूर्ववर्ती था
- 10
नजराना — नए जागीरदार द्वारा राज्य को एकमुश्त भुगतान
- भेंट — त्योहारों पर अनिवार्य उपहार जागीरदारों और प्रजा से
- ये औपचारिक राजस्व व्यवस्था से परे अर्ध-राजकोषीय वसूली थी
- शुद्ध मुगल शैली के राजस्व संग्रह से राजपूत व्यवस्था को अलग करती थीं
- 11
टोडर मल ने अजमेर सूबे में जब्त/दहसाला व्यवस्था लागू की
- भूमि को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया
- पोलज (वार्षिक जुती), परौती (आंशिक परती)
- चाचर (तीन वर्ष परती), बंजर (बंजर भूमि)
- 12
मेवाड़ में पाइक व्यवस्था — वंशानुगत ग्राम रक्षा और प्रशासनिक कर्तव्य
- निम्न श्रेणी के सामुदायिक सदस्यों को सौंपा गया
- छोटे भूमि अनुदान सेवा के बदले दिए जाते थे
- जागीर सिद्धांत का ग्राम-स्तरीय सूक्ष्म रूप
- 13
फरवरी 2026 में राजस्थान सरकार ने 3 ऐतिहासिक स्थानों के नाम बदलने की घोषणा की
- माउंट आबू का नया नाम आबूराज
- कामां का नया नाम कामवन
- जहाजपुर का नया नाम यज्ञपुर
- राजस्थान की प्रशासनिक स्मृति से जुड़े ऐतिहासिक स्थान-नामों की पुनर्स्थापना
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इस विषय में राजस्थान लोक सेवा आयोग क्या पढ़ना और परखना चाहता है?
राजस्व एवं प्रशासनिक व्यवस्थाएँ विषय में राजस्थान लोक सेवा आयोग राजस्थान के राजपूत, मुगल, ब्रिटिश और स्वतंत्रता-पश्चात भूमि-प्रशासन के बदलते ढाँचे को परखता है। राजस्थान लोक सेवा आयोग पाठ्यक्रम के अनुसार सामान्य ज्ञान एवं सामान्य अध्ययन का प्रश्नपत्र प्रथम 200 अंक का है।
इस विषय में क्या है
यह विषय मध्यकालीन और आधुनिक-पूर्व राजस्थान की राजस्व एवं प्रशासनिक व्यवस्था को समाहित करता है। इसमें राजपूत-युगीन जागीरदारी-खालसा ढाँचा, मुगल प्रभाव, ब्रिटिश प्रभुसत्ता सुधार और आधुनिक भूमि प्रशासन की ओर स्वतंत्रता-पश्चात संक्रमण शामिल हैं। राजस्थान लोक सेवा आयोग 2026 पाठ्यक्रम इसे प्रश्नपत्र प्रथम, इकाई 1 (इतिहास), भाग अ के अंतर्गत राजस्थान के संदर्भ में रखता है।
मुख्य वाक्यांश "बदलते स्वरूप" यह संकेत देता है कि किसी एक युग का स्थिर विवरण पर्याप्त नहीं है। राजस्थान लोक सेवा आयोग एक कालक्रमिक-तुलनात्मक विवेचना की अपेक्षा करता है, जो यह दर्शाए कि ये व्यवस्थाएँ विभिन्न कालखंडों में कैसे विकसित हुईं।
विषय-सीमाएँ
यह विषय संस्थागत दृष्टि से वहाँ से शुरू होता है जहाँ विषय #2 (शासकों की राजनीतिक-सांस्कृतिक उपलब्धियाँ) समाप्त होता है। विषय #2 राजवंशीय राजनीति पर केंद्रित है; यह विषय उन राजवंशों द्वारा संचालित राजस्व और प्रशासनिक तंत्र को आवृत करता है। यह विषय #4 के 19वीं–20वीं सदी के किसान आंदोलनों पर केंद्रित होने से पहले समाप्त होता है, यद्यपि वे आंदोलन यहाँ परीक्षित राजस्व शिकायतों के प्रत्यक्ष परिणाम हैं।
जागीरदारी उन्मूलन अधिनियम (1952) और राजस्थान काश्तकारी अधिनियम (1955) दोनों विषयों की साझा सामग्री हैं।
राजस्थान लोक सेवा आयोग क्या परखता है
पूर्ववर्षीय प्रश्न रिकॉर्ड में दो पुष्ट प्रश्न हैं:
- ड्योढ़ीदारों पर 2 अंक का तथ्यात्मक प्रश्न (2023) — विशेष प्रशासनिक पदाधिकारियों की जानकारी परखता है
- मध्यकालीन राजस्थान की राजस्व व्यवस्था पर 10 अंक का महत्त्वपूर्ण प्रश्न (2024)
10 अंक के प्रश्न का स्वरूप दर्शाता है कि राजस्थान लोक सेवा आयोग केवल रटने की बजाय संरचनात्मक विश्लेषण को महत्त्व देता है। परीक्षार्थियों को यह दिखाना होगा कि व्यवस्था कैसे काम करती थी, मुगल प्रभाव ने इसे कैसे बदला, और ब्रिटिश सुधारों ने इसकी जगह क्या लिया। संग्रह में 34 आदर्श प्रश्नोत्तर परीक्षकों की उप-विषयों में गहरी रुचि की पुष्टि करते हैं।
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अभ्यास में जाने से पहले उत्तर संरचना जाँचने के लिए इन प्रश्नों का उपयोग करें।
15Mराजपूताना की त्रिस्तरीय भूमि वर्गीकरण व्यवस्था (जागीर, खालसा, भोम) की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर
राजपूत-काल के राजस्थान में भूमि तीन श्रेणियों में विभाजित थी: जागीर — सैनिक सेवा के बदले सामंतों को दी जाने वाली भूमि; खालसा — राज्य की सीधे प्रशासित भूमि जिससे शासक को राजस्व मिलता था; और भोम — भोमिया राजपूतों की वंशानुगत ग्राम भूमि जिस पर रीति-सम्मत काश्तकारी अधिकार था। यह त्रिस्तरीय व्यवस्था 1952 के जागीरदारी उन्मूलन तक सामंती राजनीतिक अर्थव्यवस्था का आधार रही।
~50 शब्द · 5 अंक
