RAS प्रश्न
मेवाड़ में रतनसिंह के उत्तराधिकार-विवाद और महादजी सिंधिया से सहायता की बात किस शासक के दौर से जुड़ी है?
सही उत्तर: (A) महाराणा अरिसिंह द्वितीय।
रतनसिंह के उत्तराधिकार के दावे और रतनसिंह को महादजी सिंधिया से मिले समर्थन का प्रसंग मेवाड़ के शासक महाराणा अरिसिंह द्वितीय से जुड़ा है।
व्याख्या
Eternal Mewar के अनुसार महाराणा राजसिंह द्वितीय की निःसंतान मृत्यु के बाद अरिसिंह द्वितीय को शासक चुना गया और 3 अप्रैल 1761 को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया गया। उत्तराधिकार का विवाद तब शुरू हुआ, जब राजसिंह द्वितीय की पत्नी झाली रानी ने उनकी मृत्यु के बाद रतनसिंह नाम के पुत्र को जन्म दिया। अरिसिंह द्वितीय के स्वभाव और मराठों के हाथों मिली हारों के कारण कई सरदारों का उन पर भरोसा घट गया और वे रतनसिंह को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाना चाहते थे। Eternal Mewar के विवरण में यह भी दर्ज है कि अरिसिंह द्वितीय ने 1769 में महादजी राव सिंधिया से संधि की। महादजी सिंधिया ने रतनसिंह का पक्ष लिया, देवगढ़ के रावत जसवंत सिंह ने सिंधिया का समर्थन किया और मेवाड़ के सरदारों के समर्थन से कुंवर रतनसिंह ने अरिसिंह द्वितीय का शासन पलटने की कोशिश की। इसलिए ये सभी घटनाएँ अरिसिंह द्वितीय के शासनकाल से जुड़ी हैं।
बाक़ी विकल्प गलत क्यों हैं
- (B) महाराणा जगतसिंह द्वितीय का प्रसंग हुरड़ा सम्मेलन, मराठों की ओर से चौथ का दबाव, बाजीराव की उदयपुर-नाथद्वारा यात्रा और जयपुर के उत्तराधिकार की राजनीति से जुड़ा है, मेवाड़ की गद्दी पर रतनसिंह के दावे से नहीं।
- (C) महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय का प्रसंग मराठा हमलों, मंदिरों और महलों के निर्माण, शिलालेखों तथा मेवाड़ चित्रकला से जुड़ा है। ये घटनाएँ अरिसिंह द्वितीय के दौर में रतनसिंह के उत्तराधिकार को लेकर हुए विवाद से पहले की हैं।
- (D) महाराणा भीमसिंह का शासनकाल बाद के मेवाड़ संकट से जुड़ा है, जिसमें शक्तावत-चूंडावत प्रतिद्वंद्विता, अंबाजी इंग्लिया, कुंभलगढ़ और कृष्णा कुमारी का प्रसंग शामिल है। इसका रतनसिंह के उत्तराधिकार-विवाद से संबंध नहीं है।
अवधारणा
इस प्रश्न में 18वीं सदी के उत्तरार्ध में मेवाड़ की उत्तराधिकार-राजनीति, सरदारों की निर्णायक भूमिका और राजपूत राज्यों के विवादों में बढ़ते मराठा प्रभाव की समझ परखी जाती है। RAS में किसी शासक को उससे जुड़ी घटना से मिलाने वाले प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं, क्योंकि इनमें पास-पास के शासकों और घटनाओं को अलग पहचानने के साथ राजवंश के घटनाक्रम को राजस्थान के व्यापक राजनीतिक बदलाव से जोड़ना पड़ता है।
