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RAS प्रश्न

दिए गए सांस्कृतिक इतिहास स्रोतों में ढोलामारू के लिए कौन-सा वर्णन समर्थित है?

सही उत्तर: (A) लोककथा-आधारित काव्य और चावण्ड से जुड़ी मेवाड़ चित्र-परम्परा, दोनों से संबंधित कृति।।

ढोलामारू लोककथा-आधारित राजस्थानी काव्य और चावण्ड से जुड़ी मेवाड़ चित्र-परम्परा, दोनों से संबंधित है।

  1. (A)

    लोककथा-आधारित काव्य और चावण्ड से जुड़ी मेवाड़ चित्र-परम्परा, दोनों से संबंधित कृति।

  2. (B)

    अमरसिंह काल में निसारदीन द्वारा चित्रित 1605 ई. की रागमाला पांडुलिपि।

  3. (C)

    नरपति नाल्ह की 13वीं सदी की प्रेमाख्यान कृति बीसलदेव रास।

  4. (D)

    हेमरल सूरि की गोरा बादल री चौपाई, जिसमें मुख्य रूप से वीर रस है।

व्याख्या

ढोलामारू की पहचान सिर्फ एक साहित्यिक नाम तक सीमित नहीं है। ढोला मारवण री चौपाई लोककथा पर आधारित राजस्थानी काव्य है और ढोलामारू में नाटकीयता का संकेत मिलता है। Wisdomlib भी ढोला-मारू को लोककथा से जोड़ता है और बताता है कि कवि कलोल ने इसे 1550-60 में डिंगल भाषा में रचा। इसी चित्र का संबंध अघातपुर, मेवाड़, राजस्थान, लगभग 1592 ई. और राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली के पंजीयन से है। इस कारण ढोलामारू साहित्य और मेवाड़ चित्रकला, दोनों परम्पराओं से जुड़ा है।

बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं

  • (B) 1605 ई. में निसारदीन द्वारा चित्रित रागमाला पांडुलिपि रागमाला से जुड़ी है, ढोलामारू से नहीं।
  • (C) बीसलदेव रास अलग प्रेमाख्यान कृति के रूप में नरपति नाल्ह से जुड़ा है, इसलिए वह ढोलामारू की कृति नहीं है।
  • (D) गोरा बादल री चौपाई हेमरल सूरि से जुड़ी है और वीर रस के संदर्भ में आती है, इसलिए यह ढोलामारू की पहचान से मेल नहीं खाती।

अवधारणा

राजस्थान की लोककथा, डिंगल काव्य और मेवाड़ चित्रकला आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं। RAS में ऐसी चीजें बार-बार आती हैं, क्योंकि एक ही सांस्कृतिक कृति साहित्य और चित्र-परम्परा, दोनों में पूछी जा सकती है।

स्रोत

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