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RAS प्रश्न

उपनिषदीय अवधारणा 'तत् त्वम् असि' किसमें है?

सही उत्तर: (A) छांदोग्य उपनिषद।

'तत् त्वम् असि' छांदोग्य उपनिषद में आने वाला उपनिषदीय वाक्य है, जिसमें व्यक्तिगत आत्मा और सार्वभौमिक आत्मा की एकता का भाव व्यक्त होता है।

  1. (A)

    छांदोग्य उपनिषद

  2. (B)

    मुंडक उपनिषद

  3. (C)

    ईश उपनिषद

  4. (D)

    बृहदारण्यक उपनिषद

व्याख्या

'तत् त्वम् असि' का शाब्दिक भाव 'तू वही है' है, और यह छांदोग्य उपनिषद में आता है। उद्दालक आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को यह शिक्षा देते हैं। Britannica भी इसे छांदोग्य उपनिषद के छठे अध्याय में बार-बार आने वाला प्रसिद्ध वाक्य बताता है, जहाँ शिक्षक उद्दालक आरुणि अपने पुत्र को ब्रह्म, यानी सर्वोच्च सत्य, के स्वरूप की शिक्षा देते हैं। इसलिए यह उपनिषदीय विचार मुंडक, ईश या बृहदारण्यक उपनिषद से नहीं, बल्कि छांदोग्य उपनिषद से जुड़ा है। इसका मुख्य दार्शनिक संकेत व्यक्तिगत आत्मा और सार्वभौमिक आत्मा के संबंध या एकता को समझाना है।

बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं

  • (B) मुंडक उपनिषद 'तत् त्वम् असि' का स्रोत नहीं है; यह 'सत्यमेव जयते' से जुड़ा है, जबकि 'तत् त्वम् असि' छांदोग्य उपनिषद में आता है।
  • (C) ईश उपनिषद में ईश्वर की सर्वव्यापकता की चर्चा है, इसलिए यह 'तत् त्वम् असि' वाले छांदोग्य उपनिषद की जगह सही नहीं बैठता।
  • (D) बृहदारण्यक उपनिषद 'अहं ब्रह्मास्मि' से जुड़ा है, जबकि 'तत् त्वम् असि' छांदोग्य उपनिषद से संबंधित है।

अवधारणा

यह विषय प्राचीन भारतीय इतिहास में उपनिषदों और उनके प्रमुख दार्शनिक वाक्यों की पहचान से जुड़ा है। RAS में ऐसे प्रश्न इसलिए बार-बार आते हैं क्योंकि वे ग्रंथ, विचार और उनसे जुड़े वैदिक-उपनिषदीय संदर्भ को सीधे मिलाकर पूछते हैं।

स्रोत

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