RAS प्रश्न
'तत् त्वम् असि' (तू वही है) की दार्शनिक अवधारणा, जो आत्मा और ब्रह्म की एकता व्यक्त करती है, किस उपनिषद में मिलती है?
सही उत्तर: (B) छांदोग्य उपनिषद।
'तत् त्वम् असि' की आत्मा और ब्रह्म की एकता बताने वाली अवधारणा छांदोग्य उपनिषद के छठे अध्याय में मिलती है, जहाँ उद्दालक आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्म के स्वरूप का उपदेश देते हैं।
व्याख्या
'तत् त्वम् असि' चार महावाक्यों में गिना जाता है, क्योंकि यह साधारण उपदेश नहीं, आत्मा और ब्रह्म के संबंध को सीधे बताने वाला कथन है। यह वाक्य छांदोग्य उपनिषद के छठे अध्याय में बार-बार आता है। प्रसंग में उद्दालक आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्म, यानी परम सत्य, के स्वरूप की शिक्षा देते हैं। पहचान किसी सामान्य उपनिषद-सूची से नहीं, इसी प्रसंग से तय होती है। छांदोग्य उपनिषद 6.8.7 का उल्लेख इसी कारण निर्णायक है: वही स्थान 'तत् त्वम् असि' को आत्मा और ब्रह्म की एकता से जोड़ता है।
बाक़ी विकल्प गलत क्यों हैं
- (A) मुंडक उपनिषद 'तत् त्वम् असि' का स्थान नहीं है; यह महावाक्य छांदोग्य उपनिषद के छठे अध्याय से जुड़ा है।
- (C) कठ उपनिषद में उद्दालक आरुणि और श्वेतकेतु वाला वही प्रसंग नहीं आता; वह प्रसंग छांदोग्य उपनिषद में है।
- (D) बृहदारण्यक उपनिषद यहाँ सही नहीं है, क्योंकि 'तत् त्वम् असि' छांदोग्य उपनिषद 6.8.7 से संबंधित है।
अवधारणा
यह प्रश्न प्राचीन भारतीय इतिहास में उपनिषद और वेदांत दर्शन की मूल अवधारणाओं की पहचान जाँचता है। ऐसे महावाक्य बार-बार पूछे जाते हैं, क्योंकि उनसे ग्रंथ, प्रसंग और दार्शनिक अर्थ तीनों एक साथ जुड़ते हैं।
