RAS प्रश्न
दिल्ली का गुप्तकालीन लौह स्तंभ दिखाता है कि प्राचीन भारतीयों ने किसमें कुशलता हासिल कर ली थी:
सही उत्तर: (D) जंगरोधी लोहे का धातुकर्म।
दिल्ली का गुप्तकालीन लौह स्तंभ प्राचीन भारतीयों की जंग-रोधी लौह धातुकर्म पर मज़बूत पकड़ का प्रमाण है।
व्याख्या
दिल्ली का लौह स्तंभ सामान्य शिल्प की वस्तु नहीं, बल्कि उन्नत लौह धातुकर्म का प्रमाण है। ब्रिटानिका इसे गुप्तकाल का लगभग 6 टन वज़नी और करीब 7.2 मीटर ऊँचा लौह स्तंभ बताता है, जिस पर 1,600 से अधिक वर्षों में भी अपेक्षाकृत कम जंग लगी है। इसके लोहे में लगभग 0.25% फॉस्फोरस है। इससे सतह पर लोह-हाइड्रोजन-फॉस्फेट की एक सुरक्षात्मक निष्क्रिय परत बनती है, जिसे मिसावाइट भी कहा जाता है। ब्रिटानिका के अनुसार फॉस्फेट की रासायनिक क्रियाएँ सतह पर लोह-हाइड्रोजन-फॉस्फेट-हाइड्रेट की पतली जंग-रोधी परत बनाती हैं। बालसुब्रमण्यम ने इस सुरक्षा को भारतीय कारीगरों की सोच-समझकर धातु चुनने की क्षमता से जोड़ा है। इसलिए यह स्तंभ सावधानी से धातु चुनने और लोहे पर कुशलता से काम करने पर आधारित जंग-रोधी लौह तकनीक का प्रमाण है, न कि काँच बनाने, सोना गलाने या कागज़ बनाने का।
बाक़ी विकल्प गलत क्यों हैं
- (A) काँच बनाने का कौशल दिल्ली के लौह स्तंभ से नहीं जुड़ता, क्योंकि प्रमाण स्तंभ में लोहे की संरचना और उसके जंग-रोधी गुणों से मिलता है।
- (B) सोना गलाने का इससे संबंध नहीं है, क्योंकि स्तंभ मुख्यतः लोहे का बना है और इसका महत्व फॉस्फोरस-युक्त लौह धातुकर्म तथा जंग-रोधी सतह में है।
- (C) कागज़ बनाने का स्तंभ की सामग्री, उसके निर्माण या जंग-रोधी सतही रसायन से कोई संबंध नहीं है।
अवधारणा
यह प्रश्न प्राचीन भारतीय इतिहास में तकनीकी उपलब्धियों, खासकर गुप्तकाल के सांस्कृतिक और वैज्ञानिक संदर्भ में धातुकर्म की समझ जाँचता है। RAS में ऐसे उदाहरण बार-बार पूछे जाते हैं, क्योंकि लौह स्तंभ जैसे भौतिक प्रमाण पुरातत्त्व, विज्ञान और राजव्यवस्था को एक ही तथ्यात्मक उदाहरण से जोड़ते हैं।
