RAS प्रश्न
चोल कांस्य नटराज किस तकनीक से ढाले जाते हैं?
सही उत्तर: (B) लॉस्ट-वैक्स (सिर पेरड्यू) तकनीक।
चोल कांस्य नटराज मोम-क्षय या मधुच्छिष्ट विधि से ढाले जाते हैं, जिसमें मोम का मॉडल मिट्टी से ढककर गरम किया जाता है और फिर खाली साँचे में पिघला कांसा डाला जाता है।
व्याख्या
चोल कांस्य मूर्तियों में सही तकनीक मोम-क्षय विधि है। पहले कलाकार मोम से पूरी आकृति बनाते थे, फिर उस पर मिट्टी की परत चढ़ाकर सांचा तैयार किया जाता था। गरम करने पर मोम पिघलकर निकल जाता था, इसलिए भीतर वही खाली जगह बचती थी जो मूर्ति का आकार बनाती थी। इसके बाद उस खाली साँचे में पिघला कांसा डाला जाता था। ठंडा होने पर मिट्टी तोड़कर मूर्ति निकाली जाती, इसलिए हर प्रतिमा अलग और अनूठी होती थी। NCERT स्रोत भी तमिलनाडु की कांस्य मूर्तियों के लिए इसी मोम-क्षय या मधुच्छिष्ट विधि का उल्लेख करता है और बृहदीश्वर मंदिर के शिव नटराज को इसका उत्कृष्ट उदाहरण बताता है।
बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं
- (A) रेत ढलाई में मोम की आकृति बनाकर उसे मिट्टी के साँचे से गलाकर निकालने की प्रक्रिया नहीं होती, जबकि चोल नटराज की पहचान इसी मोम-क्षय विधि से जुड़ी है।
- (C) त्रि-आयामी मुद्रण आधुनिक निर्माण तकनीक है; चोल कांस्य नटराज पारंपरिक मोम-क्षय ढलाई से बनाए जाते थे।
- (D) धातु-साँचा ढलाई स्थायी धातु साँचे के उपयोग से जुड़ी पद्धति है, जबकि चोल कांस्य में मिट्टी का सांचा तोड़कर प्रतिमा निकाली जाती थी।
अवधारणा
यह प्रश्न प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय कला में चोल कांस्य शिल्प और धातु-कर्म की तकनीक को जांचता है। RAS में ऐसी कलात्मक परंपराएं बार-बार आती हैं क्योंकि वे राजवंश, धर्म, शिल्प और सांस्कृतिक विरासत को एक साथ जोड़ती हैं।
