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RAS प्रश्न

कबीर के दर्शन में ज़ोर था:

सही उत्तर: (D) ईश्वर की एकता, कर्मकांड की अस्वीकृति, जाति समानता — हिंदू-मुस्लिम विचारों का समन्वय।

कबीर के दर्शन में ईश्वर की एकता, कर्मकांड की अस्वीकृति, जाति-समानता और हिंदू-मुस्लिम धार्मिक रूढ़ियों से परे भक्ति पर जोर था।

  1. (A)

    केवल इस्लामी कानून

  2. (B)

    केवल ज्योतिष

  3. (C)

    केवल हिंदू कर्मकांड

  4. (D)

    ईश्वर की एकता, कर्मकांड की अस्वीकृति, जाति समानता — हिंदू-मुस्लिम विचारों का समन्वय

व्याख्या

कबीर लगभग 15वीं शताब्दी में वाराणसी के जुलाहा-कवि थे। उनके विचारों का केंद्र किसी एक मजहबी कानून या कर्मकांड में नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रत्यक्ष अनुभव, समानता और सादगी में था। NCERT के अनुसार कबीर ने प्रमुख धार्मिक परंपराओं की कट्टरता को तीखे ढंग से ठुकराया और ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म तथा इस्लाम, दोनों की बाहरी पूजा-पद्धतियों का उपहास किया। उन्होंने पुरोहित वर्ग की प्रधानता और जाति-व्यवस्था को भी अस्वीकार किया। वे निराकार परमेश्वर में विश्वास रखते थे और मुक्ति का मार्ग भक्ति को मानते थे। इसलिए कबीर के दर्शन का सही सार ईश्वर की एकता, कर्मकांड-विरोध, जाति-समानता और हिंदू-मुस्लिम विचारों के समन्वय में है।

बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं

  • (A) कबीर ने केवल इस्लामी कानून पर जोर नहीं दिया; NCERT के अनुसार उन्होंने इस्लाम की बाहरी धार्मिकता सहित प्रमुख धार्मिक रूढ़ियों को अस्वीकार किया।
  • (B) कबीर की शिक्षा ज्योतिष-केंद्रित नहीं थी; उनका जोर ईश्वर के अनुभव, भक्ति, समानता और कर्मकांड-विरोध पर था।
  • (C) कबीर केवल हिंदू कर्मकांड के समर्थक नहीं थे; उन्होंने ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म की बाहरी पूजा और पुरोहित प्रधानता की खुली आलोचना की।

अवधारणा

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन में निर्गुण संत परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार की समझ RAS के लिए महत्वपूर्ण है। कबीर के विचार धर्म, जाति और समाज-सुधार को एक साथ जोड़ते हैं, इसलिए RAS में उनसे जुड़े प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।

स्रोत

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