RAS प्रश्न
केशवानंद भारती मामले (1973) में, सर्वोच्च न्यायालय ने कौन सा सिद्धांत प्रतिपादित किया?
सही उत्तर: (D) मूल संरचना सिद्धांत।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसके अनुसार संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसकी मूल संरचना नहीं बदल सकती।
व्याख्या
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में 13-न्यायाधीशों की पीठ ने 7:6 बहुमत से संसद की संशोधन-शक्ति की सीमा तय की। निर्णय का सार यह है कि अनुच्छेद 368 संसद को संविधान के किसी भी भाग में संशोधन की शक्ति देता है, लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले में 13 न्यायाधीशों की सबसे बड़ी पीठ के माध्यम से अनुच्छेद 368 की शक्ति को “मूल संरचना” या “आवश्यक विशेषताओं” के सिद्धांत से सीमित माना। इसलिए सही सिद्धांत मूल संरचना सिद्धांत है, न कि सामान्य विधिक सिद्धांतों में से कोई अन्य।
बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं
- (A) पृथक्करणीयता का सिद्धांत पहले से स्थापित सिद्धांत था, जबकि केशवानंद भारती (1973) में प्रतिपादित सिद्धांत मूल संरचना सिद्धांत था।
- (B) ग्रहण का सिद्धांत भी पहले से स्थापित था और केशवानंद भारती मामले का केंद्रीय प्रतिपादन मूल संरचना सिद्धांत था।
- (C) प्रसाद का सिद्धांत अलग संवैधानिक अवधारणा है; यह अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संशोधन-शक्ति पर लगाई गई मूल संरचना सीमा को नहीं बताता।
अवधारणा
संविधान संशोधन और न्यायिक समीक्षा का यह मूल सिद्धांत संसद की शक्ति और संविधान की सीमाओं के बीच संतुलन तय करता है। RAS में यह बार-बार आता है क्योंकि भारतीय संविधान की स्थिरता और संशोधन-प्रक्रिया समझने के लिए केशवानंद भारती मामला आधारभूत है।
