RAS प्रश्न
राजस्थानी लोक परंपरा में 'भोपा' क्या होता है?
सही उत्तर: (A) फड़ के साथ लोक गाथाएँ सुनाने वाला पुजारी-गायक।
राजस्थानी लोक परंपरा में भोपा फड़ के सहारे पाबूजी और देवनारायण जैसे लोक देवताओं की गाथाएँ सुनाने वाला पारंपरिक पुजारी-गायक होता है।
व्याख्या
राजस्थानी लोक परंपरा में “भोपा” की भूमिका फड़ से जुड़ी कथावाचन परंपरा में आती है। फड़ राजस्थान की धार्मिक लोक चित्रकला है, जिसमें कपड़े या कैनवास पर पाबूजी और देवनारायण जैसे लोक देवताओं की कथाएँ चित्रित रहती हैं। भोपा इसी फड़ को अपने साथ रखता है और उसके सहारे लोक गाथाएँ सुनाता है। भोपा को पुजारी-गायक माना जाता है। वह रावणहत्था बजाता है और उसकी पत्नी, भोपी, दीपक से फड़ को रोशन करती है। इसलिए भोपा की सही पहचान कारीगर, व्यापारी या मंदिर-रक्षक की नहीं, बल्कि फड़ से जुड़ी कथावाचन परंपरा के पुजारी-गायक की है।
बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं
- (B) कुम्हार धार्मिक मूर्तियाँ बना सकता है, लेकिन भोपा का काम फड़ के सहारे लोक देवताओं की गाथाएँ सुनाना है, मूर्ति बनाना नहीं।
- (C) मेले आयोजित करना व्यापारी या आयोजक की भूमिका हो सकती है, जबकि भोपा फड़ लेकर चलने वाला पुजारी-गायक होता है।
- (D) मंदिरों की रक्षा करने वाला योद्धा भोपा नहीं कहलाता, क्योंकि भोपा की पहचान लोक गाथा सुनाने और फड़ परंपरा से जुड़ी है।
अवधारणा
राजस्थान की लोक देवता और फड़ परंपरा में सांस्कृतिक भूमिकाओं की पहचान महत्वपूर्ण है। ऐसे सवाल बार-बार आते हैं क्योंकि इनमें व्यक्ति, वाद्य, चित्रकला और कथावाचन परंपरा को अलग-अलग समझना पड़ता है।
