RAS प्रश्न
राजस्थान की लोक-नाट्य परंपरा में तुर्रा-कलंगी के संदर्भ में किसे दंगल कहा जाता है?
सही उत्तर: (A) शिव-शक्ति के विचार जन-सामान्य तक पहुँचाने वाली काव्यमय रचनाएँ।
तुर्रा-कलंगी परंपरा में दंगल उन काव्यमय संरचनाओं को कहा जाता था जिनके माध्यम से शिव-शक्ति के विचार लोक जीवन तक पहुँचाए गए।
व्याख्या
IGNCA के “राजस्थान में रंगकर्म” पृष्ठ पर दंगल को तुर्रा-कलंगी ख्याल के भीतर समझाया गया है। वहाँ तुर्रा को महादेव शिव और कलंगी को पार्वती का प्रतीक बताया गया है। तुकनगीर तुर्रा पक्ष के पक्षकार थे और शाह अली कलंगी पक्ष के। इन दोनों पक्षों के खिलाड़ियों ने तुर्रा-कलंगी के माध्यम से शिव-शक्ति के विचार लोक जीवन तक पहुँचाए। स्रोत आगे साफ करता है कि इस प्रचार का मुख्य माध्यम काव्यमय संरचनाएँ थीं, जिन्हें लोक समाज में दंगल कहा जाता था। इसलिए दंगल का अर्थ कोई खेल, अलग लोक-काव्य प्रतियोगिता या नौटंकी प्रदर्शन नहीं, बल्कि तुर्रा-कलंगी संदर्भ की वही काव्यमय रचनाएँ हैं।
बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं
- (B) कपड़े की बिसात पर पासे या कौड़ियों से खेला जाने वाला घरेलू खेल चौपड़-चौसर के प्रसंग से जुड़ता है, जबकि स्रोत दंगल को तुर्रा-कलंगी की काव्यमय संरचनाएँ बताता है।
- (C) बीकानेर-जैसलमेर की लोक-काव्य प्रतियोगिताओं से रम्मत के विकास का प्रसंग अलग है; दंगल को स्रोत ने तुर्रा-कलंगी में शिव-शक्ति विचार पहुँचाने वाली रचनाओं के रूप में रखा है।
- (D) करौली, भरतपुर और आसपास की नौटंकी अलग नाट्य रूप है; दंगल के लिए स्रोत तुर्रा-कलंगी के काव्यात्मक संवाद और संरचनाओं का संदर्भ देता है।
अवधारणा
यह प्रश्न राजस्थान की लोक-नाट्य और ख्याल परंपरा में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों की समझ जाँचता है। RAS में ऐसे प्रश्न बार-बार आते हैं, क्योंकि एक जैसे दिखने वाले लोक-रूपों को उनके सही क्षेत्र, प्रसंग और अर्थ से अलग करना जरूरी होता है।
