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RAS प्रश्न

राजस्थान की कला-संस्कृति में ‘पुष्टिमार्गीय’ संकेत मुख्यतः किस परंपरा से जुड़ता है?

सही उत्तर: (A) नाथद्वारा में श्रीनाथजी की वैष्णव उपासना, जिसमें कृष्ण के बालरूप पर बल है।

राजस्थान की कला-संस्कृति में पुष्टिमार्गीय संकेत नाथद्वारा के श्रीनाथजी की वैष्णव उपासना से जुड़ता है, जिसमें कृष्ण के बालरूप पर बल है।

  1. (A)

    नाथद्वारा में श्रीनाथजी की वैष्णव उपासना, जिसमें कृष्ण के बालरूप पर बल है

  2. (B)

    दिलवाड़ा और रणकपुर के जैन मंदिरों से जुड़ी पूजा-पद्धति

  3. (C)

    मेवाड़ में एकलिंगजी पर केंद्रित शैव राजकीय भक्ति

  4. (D)

    दरगाहों और उर्स मेलों से जुड़ी सूफी आस्था-परंपरा

व्याख्या

यह प्रश्न सीधे धार्मिक-सांस्कृतिक शब्द की पहचान पूछता है। देवस्थान विभाग श्रीनाथजी मंदिर का स्थान नाथद्वारा बताता है और आराध्य देव को श्रीनाथजी, यानी कृष्ण, कहता है। वही विवरण मंदिर को वैष्णव संप्रदाय और वल्लभाचार्यजी द्वारा स्थापित पुष्टिमार्ग से जोड़ता है। इसमें अष्टयाम पूजा, राजभोग, शृंगार और शयन जैसी सेवाओं का उल्लेख भी है, जिनमें देवता की सेवा जीवित रूप में की जाती है। यही नाथद्वारा-श्रीनाथजी परंपरा कृष्ण के बालरूप की उपासना और पिछवाई जैसे भक्ति-वातावरण से जुड़ती है। इसलिए पुष्टिमार्गीय का सबसे सीधा संकेत विकल्प A की वैष्णव श्रीनाथजी परंपरा है।

बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं

  • (B) दिलवाड़ा और रणकपुर जैन मंदिर-परंपरा के उदाहरण हैं, जबकि पुष्टिमार्ग नाथद्वारा के श्रीनाथजी और वैष्णव उपासना से जुड़ता है।
  • (C) एकलिंगजी का संदर्भ मेवाड़ की शैव राजकीय भक्ति से जुड़ता है, पर यहां संकेत कृष्ण-केंद्रित वैष्णव पुष्टिमार्ग का है।
  • (D) दरगाह और उर्स सूफी आस्था-परंपरा के संकेत हैं, जबकि श्रीनाथजी मंदिर की सेवा, पूजा और वैष्णव पुष्टिमार्ग अलग परंपरा है।

अवधारणा

यह राजस्थान की कला-संस्कृति में धार्मिक संप्रदायों और उनसे जुड़ी मंदिर-परंपराओं की पहचान का प्रश्न है। RAS में ऐसे शब्द इसलिए बार-बार आते हैं क्योंकि एक छोटा सांस्कृतिक संकेत सीधे किसी क्षेत्र, देवालय और भक्ति-धारा से जुड़ जाता है।

स्रोत

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