RAS प्रश्न
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में, सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के दायरे को काफी विस्तृत किया। मुख्य निर्णय क्या था?
सही उत्तर: (B) 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए — मनमानी नहीं।
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 21 में ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए, मनमानी नहीं।
व्याख्या
मेनका गांधी मामले में अनुच्छेद 21 को संकीर्ण अर्थ में नहीं पढ़ा गया। सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी सामग्री को नया आयाम देते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 के अर्थ में ‘विधि’ ऐसी होनी चाहिए जो अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 की आवश्यकताओं को भी पूरा करे। इसलिए किसी व्यक्ति को प्राण या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करने वाली प्रक्रिया केवल कागज पर कानून में लिखी हुई होना पर्याप्त नहीं है। वह प्रक्रिया युक्तियुक्तता और निष्पक्षता की कसौटी पर खरी होनी चाहिए। इसी से निष्कर्ष निकलता है कि प्रक्रिया सही, न्यायसंगत और उचित हो, मनमानी, काल्पनिक या दमनकारी न हो। इसी कारण विकल्प B मुख्य निर्णय को सही तरह से पकड़ता है।
बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं
- (A) संपत्ति के अधिकार की बात मेनका गांधी मामले से नहीं निकलती; यहाँ मुद्दा अनुच्छेद 21 की प्रक्रिया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता था।
- (C) मूल अधिकारों में संसद द्वारा संशोधन की सीमा इस व्याख्या का विषय नहीं है; मेनका गांधी में अनुच्छेद 21 को अनुच्छेद 14 और 19 की कसौटियों से जोड़ा गया।
- (D) नीति निदेशक तत्वों को सभी मामलों में मूल अधिकारों पर प्रधान बताने वाला निष्कर्ष मेनका गांधी निर्णय से नहीं निकलता; निर्णय अनुच्छेद 21 की न्यायसंगत प्रक्रिया पर केंद्रित था।
अवधारणा
यह प्रश्न मूल अधिकारों, खासकर अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्या और ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ की सीमाओं को परखता है। RAS में यह इसलिए बार-बार आता है क्योंकि शासन, अधिकारों और न्यायिक सक्रियता की समझ इसी सिद्धांत से जुड़ती है।
