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RAS प्रश्न

दादू दयाल, जिन्हें 'राजस्थान का कबीर' कहा जाता है, ने किस प्रकार की भक्ति का प्रचार किया?

सही उत्तर: (C) निर्गुण भक्ति (निराकार ईश्वर की पूजा)।

दादू दयाल ने निर्गुण भक्ति का प्रचार किया, जिसमें मूर्ति-पूजा या आडंबरपूर्ण बाहरी कर्मकांडों के बजाय निराकार ईश्वर की भक्ति पर ज़ोर दिया जाता है।

  1. (A)

    वैष्णव धर्म

  2. (B)

    शैव धर्म

  3. (C)

    निर्गुण भक्ति (निराकार ईश्वर की पूजा)

  4. (D)

    सगुण भक्ति (साकार ईश्वर की पूजा)

व्याख्या

दादू दयाल (1544-1603 ई.) भक्ति परंपरा के प्रमुख संत थे और बाद में उनका राजस्थान से गहरा संबंध बना। उनकी शिक्षाओं के केंद्र में निर्गुण भक्ति थी। कबीर और गुरु नानक की तरह उन्होंने निराकार ईश्वर की भक्ति पर ज़ोर दिया तथा मूर्ति-पूजा और बाहरी धार्मिक अनुष्ठानों को अस्वीकार किया। वे आंतरिक शुद्धता, ईमानदारी, करुणा, विनम्रता, सरलता और नैतिक अनुशासन के साथ जीवन जीने की शिक्षा देते थे। उनके अनुयायियों ने इन शिक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए दादू पंथ का संगठन किया। यह राजस्थान में एक महत्त्वपूर्ण आंदोलन बना और दादू दयाल के भक्ति, समानता और सरलता के संदेश को फैलाया।

बाक़ी विकल्प गलत क्यों हैं

  • (A) वैष्णव धर्म सबसे उपयुक्त उत्तर नहीं है, क्योंकि प्रश्न दादू दयाल की भक्ति के स्वरूप के बारे में है। उनकी शिक्षा किसी विशिष्ट वैष्णव पहचान पर नहीं, बल्कि निराकार ईश्वर की निर्गुण भक्ति पर केंद्रित थी।
  • (B) शैव धर्म सही नहीं है, क्योंकि दादू दयाल निर्गुण भक्ति परंपरा के संत थे, शैव संत नहीं।
  • (D) सगुण भक्ति में साकार ईश्वर की उपासना की जाती है, जबकि दादू दयाल ने मूर्ति-पूजा को अस्वीकार किया और निराकार ईश्वर की भक्ति की शिक्षा दी।

अवधारणा

यह प्रश्न राजस्थान के इतिहास और संस्कृति में भक्ति संतों के विषय की समझ जाँचता है, खासकर इस बात की कि संत परंपराओं को ईश्वर की अवधारणा और उपासना के स्वरूप के आधार पर कैसे बाँटा जाता है। RAS के लिए दादू दयाल महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि दादू पंथ और निर्गुण भक्ति राजस्थान के धार्मिक इतिहास को मध्यकाल की व्यापक भक्ति परंपरा से जोड़ते हैं।

स्रोत

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