RAS प्रश्न
वर्ण व्यवस्था के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. प्रारंभिक वैदिक काल में वर्ण मुख्यतः व्यवसाय आधारित और लचीला था। 2. उत्तर वैदिक काल में वर्ण वंशानुगत और कठोर हो गया। 3. पुरुष सूक्त में शूद्रों का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया गया है। उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
सही उत्तर: (C) केवल 1 और 2।
वर्ण व्यवस्था पर कथनों में प्रारंभिक वैदिक काल की व्यवसाय-आधारित लचक और उत्तर वैदिक काल की जन्म-आधारित कठोरता सही हैं, जबकि पुरुष सूक्त में शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताना सम्मानसूचक नहीं है।
व्याख्या
सही संयोजन 1 और 2 है। प्रारंभिक वैदिक समाज में वर्ण मुख्यतः व्यवसाय से जुड़ा और अपेक्षाकृत लचीला था, लेकिन उत्तर वैदिक काल में यह जन्म-आधारित और कठोर बनता गया। बाद के ब्राह्मणीय सामाजिक क्रम में स्थान जन्म से निर्धारित था और शूद्रों को नीचे रखा गया। धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में प्रत्येक वर्ण के आदर्श व्यवसाय बताए गए हैं, जहां शूद्रों के लिए तीन ऊंचे वर्णों की सेवा रखी गई है। पुरुष सूक्त में ब्राह्मण मुख, क्षत्रिय भुजाएं, वैश्य जांघें और शूद्र पैर से उत्पन्न बताए गए हैं; इसलिए कथन 3 में कहा गया सम्मानपूर्ण उल्लेख सही नहीं बैठता।
बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं
- (A) A में कथन 3 भी शामिल है, जबकि पुरुष सूक्त में शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताया गया है, सम्मानजनक स्थान पर नहीं।
- (B) B केवल कथन 1 को मानता है और कथन 2 छोड़ देता है, जबकि उत्तर वैदिक काल की जन्म-आधारित कठोरता भी सही है।
- (D) D कथन 2 के साथ कथन 3 को सही मानता है और कथन 1 को छोड़ता है, जबकि सही स्थिति इसका उल्टा है: कथन 1 सही है और कथन 3 गलत है।
अवधारणा
प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास में वर्ण-व्यवस्था का स्वरूप, उसका कठोर होना और ग्रंथों से मिली वैधता केंद्रीय विषय हैं। आरएएस में वैदिक समाज, ब्राह्मणीय ग्रंथों और सामाजिक पदक्रम को साथ पढ़ने की मांग बार-बार होती है।
