RAS प्रश्न
दक्कन चित्रकला शालाओं के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (1) बीजापुर में दक्कन चित्रकला शाला इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय के संरक्षण में फली-फूली, जो 'जगद्गुरु' के नाम से जाने जाते थे। (2) दक्कन चित्रकला में मुगल शाला के विपरीत फारसी, तुर्की और यूरोपीय तत्त्वों का गहरा प्रभाव दिखता है। (3) गोलकुंडा शाला ने मुख्यतः कुतुब शाही शासकों का चित्रण किया और यह हैदराबाद शाला की प्रत्यक्ष पूर्ववर्ती थी।
सही उत्तर: (C) तीनों — (1), (2) और (3)।
दक्कन चित्रकला शालाओं पर तीनों कथन सही हैं: बीजापुर शाला इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय के संरक्षण में फली-फूली, दक्कनी चित्रकला पर फारसी, तुर्की और यूरोपीय प्रभाव स्पष्ट हैं, और गोलकुंडा शाला हैदराबाद शाला की पूर्ववर्ती रही।
व्याख्या
बीजापुर, गोलकुंडा और अहमदनगर जैसे दक्कनी दरबारों में चित्रकला अलग राजनीतिक-सांस्कृतिक संरक्षण से विकसित हुई। NCERT के अनुसार बीजापुर शाला को अली आदिल शाह प्रथम और इब्राहीम द्वितीय ने संरक्षण दिया; इब्राहीम द्वितीय कला-साहित्य के संरक्षक थे और भारतीय संगीत में भी दक्ष थे। इसलिए कथन (1) सही है। दक्कनी शैली को लंबे समय तक इंडो-फारसी कला के अंतर्गत रखा गया और उस पर फारसी-तुर्की प्रभाव स्पष्ट रहे; यूरोपीय प्रभाव भी दक्कनी चित्रकला की पहचान का हिस्सा रहा, इसलिए कथन (2) सही है। गोलकुंडा चित्रकला में कुतुब शाही दरबार और शासकीय चित्र प्रमुख रहे, और यही परंपरा निज़ामों के अधीन हैदराबाद शाला में आगे बढ़ी, इसलिए कथन (3) भी सही है।
बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं
- (A) A में कथन (3) छूट जाता है, जबकि गोलकुंडा की कुतुब शाही परंपरा को हैदराबाद शाला की पूर्ववर्ती माना गया है।
- (B) B में कथन (1) नहीं है, जबकि बीजापुर शाला इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय जैसे कला-साहित्य संरक्षक के समय फली-फूली।
- (D) D केवल कथन (1) को मानता है, जबकि दक्कनी चित्रकला के फारसी-तुर्की-यूरोपीय प्रभाव और गोलकुंडा से हैदराबाद तक की परंपरा भी सही हैं।
अवधारणा
मध्यकालीन भारतीय चित्रकला में क्षेत्रीय दरबारी शैलियों, संरक्षण और बाहरी प्रभावों की पहचान जरूरी है। RAS में ऐसे प्रश्न बार-बार आते हैं क्योंकि कला-संस्कृति में शैली, संरक्षक और कालक्रम को साथ पढ़ना पड़ता है।
