RAS प्रश्न
पृथ्वीराज रासो की रचना-विवाद के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. जी.एच. ओझा ने तर्क दिया कि चंद बरदाई का अस्तित्व ही नहीं था और पूरा ग्रंथ 15वीं शताब्दी में गढ़ा गया था। 2. ग्रंथ के अनेक पाठभेद बहुत भिन्न लंबाई में मिलते हैं (~1300 से ~16,000 श्लोक), जो स्वयं व्यापक प्रक्षेपण का प्रमाण है। 3. मिनहाज-ए-सिराज की तबकात-ए-नासिरी, एक समकालीन स्रोत, पृथ्वीराज रासो में वर्णित सभी प्रमुख घटनाओं की पुष्टि करती है। 4. कर्नल जेम्स टॉड ने पृथ्वीराज रासो को बिना आलोचनात्मक परीक्षण के एक विश्वसनीय ऐतिहासिक स्रोत के रूप में स्वीकार किया। उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
सही उत्तर: (B) केवल 2 और 4।
पृथ्वीराज रासो के पाठभेद 1300 से 16,306 पदों तक बहुत अलग-अलग लंबाई में मिलते हैं और जेम्स टॉड ने इसे प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोत की तरह प्रस्तुत किया था।
व्याख्या
कथन 2 सही है, क्योंकि पृथ्वीराज रासो के कई पाठभेद मिलते हैं और 16वीं शताब्दी के बाद प्रक्षेपणों और जोड़ों के कारण ग्रंथ का आकार बहुत बढ़ा। सबसे छोटा बीकानेर पाठ 1300 पदों का माना गया है, जबकि उदयपुर-मेवाड़ पाठ 16,306 पदों वाला सबसे लंबा पाठ है। इससे साफ है कि मौजूदा पाठ एक समान, मूल रूप में सुरक्षित नहीं रहा। कथन 4 भी सही है, क्योंकि जेम्स टॉड ने इस ग्रंथ को पश्चिमी विद्वत्ता में प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोत की तरह पेश किया, जबकि बाद में इसकी ऐतिहासिक विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठे। इसलिए सही संयोजन केवल 2 और 4 है।
बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं
- (A) A में कथन 1 और 3 लिए गए हैं, जबकि ओझा ने ग्रंथ की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाए थे, चंद बरदाई के अस्तित्व को पूरी तरह नकारने का दावा नहीं किया था, और तबकात-ए-नासिरी रासो की सभी प्रमुख घटनाओं की पुष्टि नहीं करती।
- (C) C में कथन 2 और 4 सही होने पर भी कथन 1 जोड़ दिया गया है, जो ओझा की स्थिति को अतिरंजित करता है क्योंकि विवाद ग्रंथ की प्रामाणिकता और प्रक्षेपणों पर था, चंद बरदाई के अस्तित्व के पूर्ण निषेध पर नहीं।
- (D) D सभी कथनों को सही मानता है, लेकिन कथन 1 और 3 गलत हैं; विशेषकर तबकात-ए-नासिरी को रासो की सभी घटनाओं का समर्थन बताना स्रोत-समीक्षा की दृष्टि से गलत है।
अवधारणा
राजस्थान इतिहास में साहित्यिक स्रोतों की ऐतिहासिक विश्वसनीयता और पाठालोचन की समझ जरूरी है। RAS में पृथ्वीराज रासो जैसे ग्रंथ बार-बार इसलिए आते हैं क्योंकि वे इतिहास, लोक-परंपरा और बाद के प्रक्षेपणों के बीच फर्क करने की मांग करते हैं।
