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RAS प्रश्न

बसोहली चित्रकला, पहाड़ी लघुचित्रकला की सबसे प्रारंभिक ज्ञात शैली, लगभग 17वीं शताब्दी के मध्य से फली-फूली। निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता बसोहली चित्रों को अन्य पहाड़ी शैलियों से अलग करती है?

सही उत्तर: (B) गहरे प्राथमिक रंग, मोटी उभरी हुई रेखाएं, बड़ी अभिव्यंजक आँखें, और भृंग-पंख (एलिट्रा) अलंकरण।

बसोहली चित्रकला की अलग पहचान तीव्र प्राथमिक रंगों, मोटी साहसिक रेखाओं, बड़ी अभिव्यंजक आँखों और आभूषणों में भृंग-पंख के चमकीले टुकड़ों के प्रयोग से बनती है।

  1. (A)

    हल्के पेस्टल रंग, कोमल छायांकन, और प्राकृतिक भूदृश्य वाली पृष्ठभूमि

  2. (B)

    गहरे प्राथमिक रंग, मोटी उभरी हुई रेखाएं, बड़ी अभिव्यंजक आँखें, और भृंग-पंख (एलिट्रा) अलंकरण

  3. (C)

    विस्तृत दरबारी दृश्यों और फारसी सुलेख वाले हाशियों के साथ मुगल-प्रभावित चित्रांकन

  4. (D)

    सूक्ष्म विवरण के साथ महीन कूची का काम, सोने का अलंकरण, और राजपूत दरबारी विषय

व्याख्या

बसोहली चित्रकला पहाड़ी चित्रकला की शुरुआती और सबसे नाटकीय शैलियों में गिनी जाती है। NCERT के अनुसार बसोहली में प्राथमिक रंगों और गर्म पीले रंग का मजबूत प्रयोग मिलता है, पृष्ठभूमि और क्षितिज भी इन्हीं चमकीले रंगों से भरे जाते हैं। आभूषणों में मोती दिखाने के लिए उभरे सफेद रंग और पन्ने जैसा प्रभाव देने के लिए भृंग-पंख के छोटे चमकीले हरे कण लगाए जाते थे। इसलिए विकल्प B ठीक है: यह शैली कोमल प्राकृतिक भूदृश्य या दरबारी बारीकी से नहीं, बल्कि साहसिक रंग-संयोजन, मोटी रेखा और विशिष्ट अलंकरण से पहचानी जाती है। इसके लोकप्रिय विषयों में भागवत पुराण और रसमंजरी जैसे ग्रंथ भी आते हैं।

बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं

  • (A) कोमल पेस्टल रंग, नाजुक छायांकन और प्रकृतिवादी पृष्ठभूमि बसोहली की साहसिक, गहरे रंगों वाली भाषा से मेल नहीं खाते; ये बाद की कांगड़ा प्रवृत्ति के अधिक निकट हैं।
  • (C) मुगल-प्रभावित दरबारी चित्रांकन, फारसी सुलेख और विस्तृत दरबारी दृश्य बसोहली की मुख्य पहचान नहीं हैं; बसोहली में जोर देशज साहसिक रंगों और धार्मिक-काव्य विषयों पर है।
  • (D) बसोहली में आभूषण जरूर दिखते हैं, पर उसकी निर्णायक पहचान महीन राजपूत दरबारी दृश्य नहीं, बल्कि तीव्र समतल रंग और भृंग-पंख से बना विशिष्ट आभूषण-प्रभाव है।

अवधारणा

यह प्रश्न भारतीय चित्रकला में पहाड़ी लघुचित्र परंपरा और उसके शैलीगत भेदों की समझ जांचता है। RAS में ऐसी कला-इतिहास वाली बातें इसलिए बार-बार आती हैं क्योंकि एक ही परंपरा के भीतर बसोहली, गुलेर और कांगड़ा जैसी शैलियों को अलग पहचानना पड़ता है।

स्रोत

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