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RAS प्रश्न

संविधान का अनुच्छेद 13(2) कहता है कि राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगा जो मौलिक अधिकारों को छीनता या संक्षिप्त करता है। ऐसा कानून होगा:

सही उत्तर: (D) जहाँ तक उल्लंघन है, वहाँ तक शून्य।

अनुच्छेद 13(2) के तहत मौलिक अधिकारों को छीनने या संक्षिप्त करने वाला राज्य का कानून उल्लंघन की सीमा तक शून्य होता है।

  1. (A)

    प्रभावित पक्ष की इच्छा पर शून्यकरणीय

  2. (B)

    सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द किए जाने तक वैध

  3. (C)

    शुरू से ही पूर्णतः शून्य

  4. (D)

    जहाँ तक उल्लंघन है, वहाँ तक शून्य

व्याख्या

अनुच्छेद 13(2) के तहत राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बना सकता जो इस भाग द्वारा दिए गए अधिकारों को छीनता या संक्षिप्त करता हो। ऐसा कानून पूरे-का-पूरा अपने आप नहीं गिरता; जितना भाग मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है, उतना ही शून्य होता है। इसलिए सही उत्तर D है। यही सिद्धांत न्यायिक समीक्षा से जुड़ता है: अदालत कानून की वैधता को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परख सकती है और केवल आपत्तिजनक हिस्से को निष्प्रभावी कर सकती है। “उल्लंघन की सीमा तक” का अर्थ सीमित शून्यता है, इसलिए विकल्प C जैसा अतिशय उत्तर गलत है।

बाक़ी विकल्प ग़लत क्यों हैं

  • (A) यह विकल्प कानून को प्रभावित पक्ष की पसंद पर शून्यकरणीय मानता है, जबकि अनुच्छेद 13(2) में विरोध की सीमा तक उसे शून्य माना गया है।
  • (B) यह विकल्प कानून को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द किए जाने तक वैध मानता है, जबकि विरोधी कानून उल्लंघन की सीमा तक शून्य होता है।
  • (C) यह विकल्प कानून को पूर्णतः प्रारंभ से शून्य मानता है, जबकि अनुच्छेद 13(2) केवल उल्लंघन वाले हिस्से को शून्य करता है।

अवधारणा

मौलिक अधिकारों और न्यायिक समीक्षा का मूल सिद्धांत अनुच्छेद 13 से स्पष्ट होता है। RAS में अनुच्छेद 13 बार-बार इसलिए आता है क्योंकि यह कानून और मौलिक अधिकारों के टकराव की संवैधानिक कसौटी देता है।

स्रोत

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