भारतीय रुपया 5 दिसंबर 2025 को ऐतिहासिक ₹90.5 प्रति अमेरिकी डॉलर के निचले स्तर पर पहुंचा — RBI ने सरकारी बैंकों से डॉलर बिकवाकर हस्तक्षेप किया, जिससे सुधार आया। RBI ने रेपो दर 25 bps घटाकर 5.25% की और लगभग ₹1.5 लाख करोड़ तरलता डालने की घोषणा की। अवमूल्यन के कारण: भारत-अमेरिका FTA में देरी, FII पूंजी निकासी, मजबूत अमेरिकी डॉलर (ट्रम्प की वापसी), व्यापार घाटा। राजस्थान के लिए: रत्न-आभूषण (जयपुर), संगमरमर (मकराना, किशनगढ़), हस्तशिल्प और वस्त्र तथा अंतरराष्ट्रीय पर्यटन की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है।
भारतीय रुपया ₹90.5 प्रति अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर; RBI ने रेपो दर 5.25% की, ₹1.4 लाख करोड़ की तरलता उपलब्ध कराई
भारतीय रुपया 5 दिसंबर 2025 को ऐतिहासिक ₹90.5 प्रति अमेरिकी डॉलर के निचले स्तर पर पहुंचा; RBI ने सरकारी बैंकों के ज़रिए डॉलर बेचकर हस्तक्षेप किया, जिससे सुधार हुआ। RBI ने रेपो दर 25 bps घटाकर 5.25% की और लगभग ₹1.5 लाख करोड़ की तरलता उपलब्ध कराने की घोषणा की। अवमूल्यन के कारण: भारत-अमेरिका FTA में देरी, FII पूंजी निकासी, मजबूत अमेरिकी डॉलर (ट्रम्प की वापसी), व्यापार घाटा। राजस्थान के लिए: रत्न-आभूषण (जयपुर), संगमरमर (मकराना, किशनगढ़), हस्तशिल्प-वस्त्र और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन में निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है।
मुख्य तथ्य
- भारतीय रुपया 5 दिसंबर 2025 को ₹90.5 प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँचा।
- RBI ने रेपो दर 25 आधार अंक घटाकर 5.25% कर दी और ₹1.4 लाख करोड़ की तरलता उपलब्ध कराई।
- अवमूल्यन के कारणों में भारत-अमेरिका FTA में देरी, FII निकासी और मज़बूत डॉलर शामिल हैं।
- कमज़ोर रुपया कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और पूंजीगत वस्तुओं की आयात लागत बढ़ाता है।
- IT, फार्मा और कपड़ा जैसे निर्यातोन्मुख क्षेत्रों को रुपये के अवमूल्यन से लाभ होता है।
- राजस्थान के रत्न, संगमरमर, हस्तशिल्प और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है।
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दिसंबर 2025 में रुपये के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँचने के पीछे कौन-सा कारक था?
रुपये का रिकॉर्ड निचला स्तर दिसंबर 2025 में आरबीआई रेपो दर कटौती से 5.25% के साथ आया।
स्रोत: समाचार स्रोत
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
5 दिसंबर 2025 को भारतीय रुपया किस ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँचा और RBI ने किस तरह हस्तक्षेप किया?
5 दिसंबर 2025 को भारतीय रुपया ₹90.5 प्रति अमेरिकी डॉलर के ऐतिहासिक इंट्राडे निचले स्तर पर पहुँच गया — यह अब तक का सबसे कमजोर स्तर था। RBI ने मुद्रा को स्थिर करने के लिए सरकारी बैंकों को विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर बेचने का निर्देश दिया। इसके अलावा, RBI ने रेपो दर 25 आधार अंक घटाकर 5.25% की और बॉन्ड खरीद तथा फॉरेक्स स्वैप से बैंकिंग प्रणाली में ₹1.4 लाख करोड़ की तरलता उपलब्ध कराई।
2025 के अंत में भारतीय रुपये में तेज गिरावट के मुख्य कारण क्या थे?
2025 के अंत में रुपये की तेज गिरावट के कई कारण थे: भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते (FTA) में देरी से व्यापार अनिश्चितता; वैश्विक निवेशकों के सुरक्षित संपत्तियों की ओर बढ़ने से FII पूंजी निकासी; ट्रम्प की वापसी के बाद नीतिगत बदलावों के चलते मजबूत होता अमेरिकी डॉलर; और बढ़ती आयात लागत के कारण भारत के व्यापार घाटे का बढ़ना।
रेपो दर क्या है और RBI की रेपो दर कटौती का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है?
रेपो दर वह दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है। जब RBI रेपो दर घटाता है, तो बैंक केंद्रीय बैंक से सस्ता उधार ले सकते हैं और उपभोक्ताओं व व्यवसायों को कम ब्याज दरों पर ऋण दे सकते हैं। इससे उधारी, निवेश और खपत को बढ़ावा मिलता है और आर्थिक गतिविधि तेज होती है। 2025 के अंत में 5.25% की कटौती वैश्विक विपरीत परिस्थितियों के बीच विकास को सहारा देने के लिए थी।
रुपये के अवमूल्यन से कौन से भारतीय निर्यात क्षेत्रों को लाभ होता है और राजस्थान पर इसका विशेष रूप से क्या प्रभाव पड़ता है?
कमजोर रुपया भारतीय निर्यात को वैश्विक स्तर पर सस्ता और प्रतिस्पर्धी बनाता है। IT सेवाएँ, फार्मास्यूटिकल, कपड़ा और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों को लाभ होता है क्योंकि उनकी डॉलर आय अधिक रुपये में बदलती है। राजस्थान के लिए विशेष रूप से, इससे रत्न एवं आभूषण (जयपुर), संगमरमर और पत्थर उत्पाद (मकराना, किशनगढ़), हथकरघा वस्त्र की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन आकर्षक होता है।
रुपये के अवमूल्यन के भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक परिणाम क्या हैं?
रुपये के अवमूल्यन से आयात की लागत काफी बढ़ जाती है। चूँकि भारत अपनी लगभग 80-85% कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, कमजोर रुपया सीधे ऊर्जा लागत बढ़ाता है, जिससे ईंधन महँगा होता है और व्यापक महँगाई बढ़ती है। इलेक्ट्रॉनिक्स, पूंजीगत वस्तुओं और औद्योगिक मशीनरी के आयात की लागत भी बढ़ती है। इससे चालू खाता घाटा बढ़ता है, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है और विदेशी मुद्राओं में लिए गए भारत के बाहरी कर्ज को चुकाने की लागत बढ़ जाती है।
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