1 जनवरी 2026 से यूरोपीय संघ में प्रवेश करने वाले भारतीय इस्पात और एल्युमीनियम की हर खेप पर EU के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकेनिज़्म (CBAM) के तहत कार्बन लागत लागू हो गई। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने अनुमान लगाया कि भारतीय निर्यातकों को CBAM के कर बोझ को वहन करने और प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए 15–22% तक कीमत घटानी पड़ सकती है। CBAM EU का ऐसा तंत्र है, जिसके तहत कम कार्बन मूल्य निर्धारण मानकों वाले देशों से होने वाले आयात पर उतनी ही कार्बन लागत लगाई जाती है, जितनी EU उत्पादकों को EU उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) के तहत उठानी पड़ती है। यह लेवी इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन जैसी कार्बन-गहन वस्तुओं पर उनकी उत्पादन प्रक्रिया में निहित कार्बन उत्सर्जन के आधार पर लागू होती है। भारत के पास अभी तक EU ETS के समकक्ष व्यापक घरेलू कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र नहीं है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को घरेलू कार्बन बाजार और कम-कार्बन उत्पादन प्रौद्योगिकियों के विकास में तेजी लानी चाहिए।
EU का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकेनिज़्म (CBAM) लागू: भारतीय इस्पात और एल्युमीनियम निर्यातकों पर कीमतों में 15–22% कटौती का दबाव
1 जनवरी 2026 से यूरोपीय संघ में प्रवेश करने वाले भारतीय इस्पात और एल्युमीनियम की हर खेप पर EU के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकेनिज़्म (CBAM) के तहत कार्बन लागत लगने लगी। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने अनुमान लगाया कि भारतीय निर्यातकों को CBAM के कर बोझ को खुद वहन करने और प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए 15–22% तक कीमत घटानी पड़ सकती है। CBAM EU की वह व्यवस्था है, जिसके तहत कम कार्बन मूल्य निर्धारण मानकों वाले देशों से आयातित वस्तुओं पर उतनी ही कार्बन लागत लगाई जाती है, जितनी EU उत्पादकों को EU उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) के तहत उठानी पड़ती है। यह शुल्क इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन जैसी अधिक कार्बन उत्सर्जन वाली वस्तुओं पर, उनकी उत्पादन प्रक्रिया में निहित कार्बन उत्सर्जन के आधार पर लागू होता है। भारत के पास अभी तक EU ETS के बराबर व्यापक घरेलू कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र नहीं है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को घरेलू कार्बन बाजार और कम-कार्बन उत्पादन प्रौद्योगिकियों के विकास में तेजी लानी चाहिए।
मुख्य तथ्य
- EU का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकेनिज़्म (CBAM) 1 जनवरी 2026 से लागू हुआ।
- CBAM की कार्बन लागत के कारण भारतीय इस्पात और एल्युमीनियम निर्यातकों पर कीमतों में 15-22% कटौती का दबाव है।
- CBAM का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कम कार्बन मूल्य वाले देशों से आने वाले आयात भी EU उत्पादकों के बराबर कार्बन लागत चुकाएँ।
- GTRI ने EU बाजार में भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ने वाले प्रभाव का अनुमान लगाया।
- CBAM, कार्बन रिसाव से निपटने के लिए EU की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली का हिस्सा है।
- EU बाजार तक पहुँच बनाए रखने के लिए भारतीय उद्योगों को डीकार्बनाइजेशन में निवेश करना होगा।
मेन्स दृष्टिकोण
प्रश्न: जनवरी 2026 से यूरोपीय संघ का सीबीएएम भारतीय इस्पात एवं एल्युमीनियम निर्यात को कैसे खतरा पहुँचाता है?
उत्तर (50 शब्द):
सीबीएएम उत्पादन उत्सर्जन के आधार पर यूरोपीय संघ में प्रवेश करने वाले भारतीय इस्पात एवं एल्युमीनियम पर कार्बन लागत लगाता है। जीटीआरआई अनुमान के अनुसार निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए 15-22% तक कीमतें घटानी होंगी। भारत के पास ईटीएस समकक्ष कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र नहीं है। घरेलू कार्बन बाजार और कम-कार्बन प्रौद्योगिकियाँ विकसित करना आवश्यक है।
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यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर समायोजन तंत्र (सीबीएएम) के तहत पूर्ण वित्तीय देनदारियाँ किस तारीख से प्रारंभ हुईं?
सीबीएएम का संक्रमण चरण 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हुआ। 1 जनवरी 2026 से पूर्ण वित्तीय देनदारियाँ लागू हुईं, जब यूरोपीय संघ को भेजी जाने वाली भारतीय इस्पात और एल्यूमीनियम खेपों पर कार्बन लागत लगने लगी।
स्रोत: GTRI
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
EU का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकेनिज़्म (CBAM) क्या है और यह कब पूरी तरह लागू हुआ?
CBAM यूरोपीय संघ की वह नीति है जो कम या शून्य कार्बन मूल्य निर्धारण वाले देशों के आयात पर कार्बन लागत लगाती है, ताकि EU उत्पादकों के साथ समान स्पर्धा का माहौल बने। यह 1 जनवरी 2026 से पूरी तरह लागू हो गई, यानी उस तारीख से EU में प्रवेश करने वाले पात्र सामानों पर कार्बन शुल्क लगेगा।
CBAM भारतीय इस्पात और एल्युमीनियम निर्यातकों को कैसे प्रभावित करता है?
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, भारतीय इस्पात और एल्युमीनियम निर्यातकों को CBAM कर का बोझ उठाने और EU बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए कीमतें 15–22% तक घटानी पड़ सकती हैं। इसकी वजह यह है कि EU की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली की तुलना में भारतीय उत्पादकों पर घरेलू कार्बन लागत कम है।
EU की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) क्या है और CBAM इससे कैसे जुड़ा है?
EU ETS एक कैप-एंड-ट्रेड प्रणाली है, जो EU उद्योगों के कार्बन उत्सर्जन की कीमत तय करती है। CBAM इसी व्यवस्था को आयातित वस्तुओं पर लागू करता है। इसका उद्देश्य 'कार्बन रिसाव' रोकना है, यानी ऐसी स्थिति जब EU का उत्पादन कमजोर जलवायु नियमों वाले देशों में चला जाए। CBAM यह सुनिश्चित करता है कि आयातित वस्तुएँ भी EU उत्पादकों के बराबर कार्बन मूल्य चुकाएँ।
कार्बन रिसाव क्या है और EU के लिए यह चिंता का विषय क्यों है?
कार्बन रिसाव का मतलब उस जोखिम से है, जिसमें EU उद्योग कार्बन लागत से बचने के लिए उत्पादन को कमजोर जलवायु नियमों वाले देशों में ले जाते हैं। इससे उत्सर्जन घटने के बजाय विदेश में चला जाता है। CBAM इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए आयात पर बराबर कार्बन लागत लगाता है।
CBAM के तहत EU बाजार में पहुँच बनाए रखने के लिए भारतीय उद्योगों को क्या करना होगा?
भारतीय उद्योगों — विशेषकर इस्पात और एल्युमीनियम में — को अपने उत्पादों में मौजूद कार्बन घटाने के लिए डीकार्बनाइजेशन में निवेश करना होगा। स्वच्छ उत्पादन प्रक्रियाओं से कार्बन तीव्रता कम करके भारतीय निर्यातक CBAM के तहत देनदारी और कीमतों में 15–22% की कटौती के दबाव से बच सकते हैं।
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