प्रकाशित: 19 नवंबर 2025PIBराजव्यवस्था
SC संविधान पीठ: राज्यपाल की स्वीकृति शक्तियों पर — अनिश्चित काल तक रोक नहीं
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 20 नवंबर 2025 को एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि राज्यपाल किसी राज्य विधेयक पर अनिश्चित काल तक स्वीकृति रोके नहीं रख सकता। पीठ ने माना कि स्वीकृति के लिए विधेयक प्रस्तुत होने पर राज्यपाल के पास केवल तीन संवैधानिक रूप से अनुमत विकल्प हैं: स्वीकृति देना, विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधायिका को वापस करना, या राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखना।
यह फैसला उन विवादों की पृष्ठभूमि में आया, जो बार-बार तब उठे जब राज्यपालों ने — विशेष रूप से विपक्ष-शासित राज्यों में — राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की शक्तियां असीमित नहीं हैं।
संविधान पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि राज्यपाल एक संवैधानिक पदाधिकारी है, जिसे अनुच्छेद 163 के तहत मंत्री परिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना होगा। यह निर्णय सहकारी संघवाद के संवैधानिक सिद्धांत को मजबूत करता है।
मेन्स दृष्टिकोण
प्रश्न: अनुच्छेद 200 पर नवंबर 2025 के सर्वोच्च न्यायालय संविधान पीठ के फैसले तथा केंद्र-राज्य सम्बन्धों एवं सहकारी संघवाद पर इसके प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर (50 शब्द):
20 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने निर्णय दिया कि राज्यपाल राज्य विधेयकों पर अनिश्चित काल तक स्वीकृति नहीं रोक सकते। अनुच्छेद 200 के तहत तीन विकल्प हैं — स्वीकृति देना, विधेयक को विधायिका को लौटाना, या राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखना। लंबी निष्क्रियता पर सीमित न्यायिक समीक्षा की अनुमति देकर यह फैसला पॉकेट वीटो रोकता है और सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
SC संविधान पीठ ने स्वीकृति रोकने की राज्यपाल की शक्ति के बारे में क्या फैसला दिया?
5-न्यायाधीश संविधान पीठ ने फैसला दिया कि राज्यपाल राज्य विधेयकों पर स्वीकृति अनिश्चित काल तक नहीं रोक सकते। अनुच्छेद 200 के तहत उनके पास केवल 3 विकल्प हैं: स्वीकृति देना, पुनर्विचार के लिए विधायिका को वापस भेजना, या राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखना।
राज्य विधान में राज्यपाल की भूमिका का संवैधानिक आधार क्या है?
संविधान का अनुच्छेद 200 राज्य विधेयकों पर राज्यपाल की स्वीकृति से संबंधित प्रावधान है। अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना होता है।
यह फैसला केंद्र-राज्य संबंधों के लिए क्यों महत्वपूर्ण था?
इस फैसले में विपक्ष-शासित राज्यों (तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल, पंजाब) में राज्यपालों द्वारा लंबे समय तक विधेयकों को रोके रखने की समस्या पर सीधे बात की गई। यह राज्यपालों को केंद्र के औजार की तरह काम करने से रोकता है।
राज्यपाल की शक्तियों के संदर्भ में पॉकेट वीटो क्या है?
पॉकेट वीटो तब होता है जब राज्यपाल न तो विधेयक को स्वीकृति देता है और न ही उसे वापस करता है — यानी निष्क्रिय रहकर उसे व्यावहारिक रूप से रोक देता है। SC के फैसले ने इस प्रथा पर स्पष्ट रूप से रोक लगाई।
यह फैसला भारत में सहकारी संघवाद को कैसे मजबूत करता है?
राज्यपाल के विवेक को तीन स्पष्ट संवैधानिक विकल्पों तक सीमित करके यह फैसला राज भवन को केंद्र के राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल होने से रोकता है और भारत की संघीय संरचना को मजबूत करता है।