सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण जुलाई 2020-जून 2021 पर आधारित 'भारत में प्रवासन 2020-21' रिपोर्ट में भारत की अखिल-भारतीय प्रवासन दर 28.9% दर्ज की गई। इसका अर्थ है कि जनसंख्या और विकास नीति में प्रवासन कोई हाशिये का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा, आजीविका, आवास, परिवहन और शहरी सेवाओं की योजना से सीधे जुड़ा मुद्दा है।

आंतरिक प्रवासियों के प्रवाह को देखें तो ग्रामीण मूल की धाराओं का हिस्सा 73.9% था। इसमें ग्रामीण-से-ग्रामीण प्रवासन 55.0% और ग्रामीण-से-शहरी प्रवासन 18.9% शामिल था। इसके मुकाबले शहरी मूल की धाराओं का हिस्सा 26.1% था। परीक्षा की दृष्टि से यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि प्रवासन को केवल शहरों की ओर पलायन मानना अधूरा निष्कर्ष होगा; ग्रामीण क्षेत्रों के भीतर होने वाला प्रवासन भी बहुत बड़ा हिस्सा रखता है। यही विभाजन मूल क्षेत्र और गंतव्य क्षेत्र की जरूरतों को अलग-अलग समझने में मदद करता है।

नीति-निर्माण में ये आंकड़े कई स्तरों पर काम आते हैं। ग्रामीण आजीविका और शिक्षा से जुड़ी योजनाओं में यह समझ जरूरी है कि लोग किस तरह स्थान बदल रहे हैं। आवास, परिवहन और शहरी सेवाओं की योजना में भी प्रवासी आबादी का आकार और उसका मूल क्षेत्र ध्यान में रखना पड़ता है। RAS और UPSC जैसी परीक्षाओं में ये आंकड़े जनसंख्या, शहरीकरण, रोजगार, ग्रामीण विकास और सामाजिक सुरक्षा वाले उत्तरों में उपयोगी संदर्भ देते हैं। स्टैटिक जीके में इसे जनगणना, श्रम-बल सर्वेक्षण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शहरीकरण के अध्यायों से जोड़ा जा सकता है। मुख्य परीक्षा में इससे जुड़े प्रश्न विकास योजना, सेवा वितरण और क्षेत्रीय असमानता के संदर्भ में पूछे जा सकते हैं।