विश्व वन्यजीव दिवस प्रतिवर्ष 3 मार्च को मनाया जाता है — यह वही तारीख है जब 1973 में लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय (CITES) पर हस्ताक्षर हुए थे। 2026 का विषय है "औषधीय और सुगंधित पौधे: स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का संरक्षण।" यह विषय जैव-विविधता संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान और ग्रामीण आजीविका के संगम पर ध्यान आकर्षित करता है।
भारत औषधीय वनस्पति की दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक जैव-विविध देशों में से एक है। यहाँ 15,000 से अधिक औषधीय पौधों की प्रजातियाँ दर्ज हैं। इनके अपने प्राकृतिक आवास में संरक्षण के लिए देश भर में 108 औषधीय पौधा संरक्षण क्षेत्र (MPCA) स्थापित किए गए हैं।
आयुष (आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) क्षेत्र भारत की औषधीय पौधा विरासत से गहराई से जुड़ा है।
वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में दो प्रमुख परियोजनाएँ उल्लेखनीय हैं:
- प्रोजेक्ट टाइगर: 1973 में शुरू, विश्व की 70% से अधिक जंगली बाघ आबादी भारत में पाई जाती है। 2022 के अखिल भारतीय बाघ आकलन में औसत संख्या 3,682 रही, जबकि 3,167 न्यूनतम अनुमान था।
- प्रोजेक्ट डॉल्फिन: 2020 में शुरू, इसमें गंगा नदी डॉल्फिन (राष्ट्रीय जलीय जंतु) और सिंधु नदी डॉल्फिन दोनों शामिल हैं। इस परियोजना की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है — गंगा नदी डॉल्फिन की पहली सैटेलाइट टैगिंग।
भारत की जैव-विविधता प्रतिबद्धता पेरिस समझौते के तहत NDC और कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव-विविधता फ्रेमवर्क (GBF) में भी परिलक्षित होती है।
