प्रकाशित: 21 जनवरी 2026समाचार स्रोतटॉपिक
नई दिल्ली में 77वीं गणतंत्र दिवस परेड में राजस्थान की झाँकी ने लोकप्रिय विकल्प श्रेणी में तृतीय पुरस्कार जीता — बीकानेर की प्राचीन उस्ता कला से प्रेरित
राजस्थान की झांकी ने 26 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 77वें गणतंत्र दिवस परेड में लोकप्रिय पसंद श्रेणी में तीसरा पुरस्कार जीता। यह झांकी बीकानेर की सदियों पुरानी उस्ता कला से प्रेरित थी। उस्ता कला लघु चित्रकला और सजावटी शिल्प की एक विशिष्ट शैली है, जिसमें मीनाकारी (इनेमल) तकनीक से ऊंट की खाल, चमड़े और हाथीदांत की सतहों पर सोने और चांदी का काम किया जाता है।
यह कला सदियों पहले राठौड़ वंश के बीकानेर शासकों के संरक्षण में फारस और मध्य एशिया के शिल्पकारों द्वारा बीकानेर लाई गई थी। तब से यह राजस्थान की सबसे बेशकीमती पारंपरिक कलाओं में से एक बन गई है। उस्ता समुदाय, जो अब मुख्य रूप से बीकानेर में रहता है, इस बारीक कला परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। इसे भौगोलिक संकेत के रूप में मान्यता मिली हुई है।
झांकी में ऊंट की आकृतियों, रेगिस्तानी परिदृश्यों और शाही बीकानेर वास्तुकला के रूपांकनों के जरिए उस्ता शिल्प का कलात्मक प्रदर्शन किया गया और राजस्थान की जीवंत सांस्कृतिक विरासत दिखाई गई। कर्तव्य पथ (पूर्व में राजपथ), नई दिल्ली पर होने वाली गणतंत्र दिवस परेड में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियां दिखाई जाती हैं। राजस्थान की सांस्कृतिक रूप से समृद्ध झांकियों के साथ परेड में भाग लेने की मजबूत परंपरा रही है, जिनमें पहले कालबेलिया नृत्य, पुष्कर मेला और मरुस्थलीय वन्यजीवों को भी दिखाया जा चुका है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने इस उपलब्धि को राज्य और उसके शिल्पकार समुदायों के लिए गौरव का विषय बताया।
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जुड़ा प्रश्नआसान
राजस्थान की झांकी ने गणतंत्र दिवस 2026 में कौन सा पुरस्कार जीता?
व्याख्या · सही उत्तर Cराजस्थान की झांकी ने लोकप्रिय पसंद श्रेणी में तीसरा पुरस्कार जीता।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
77वीं गणतंत्र दिवस परेड में राजस्थान की झाँकी ने कौन सा पुरस्कार जीता?
राजस्थान की झाँकी ने 26 जनवरी 2026 को नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर आयोजित 77वीं गणतंत्र दिवस परेड में पॉपुलर चॉइस श्रेणी में तृतीय पुरस्कार जीता।
उस्ता कला क्या है और इसका क्या महत्व है?
उस्ता कला बीकानेर की सदियों पुरानी शिल्प परंपरा है जिसमें ऊँट की खाल, चमड़े और हाथी दाँत की सतहों पर सोने-चाँदी का जटिल काम किया जाता है, अक्सर मीनाकारी तकनीक का उपयोग करके। यह कला फारस और मध्य एशिया के कारीगरों द्वारा राठौड़ वंश के संरक्षण में बीकानेर लाई गई थी और इसे भौगोलिक संकेत (GI) मान्यता प्राप्त है।
उस्ता कला बीकानेर तक कैसे पहुंची?
उस्ता कला को बीकानेर के राठौड़ वंश के शासकों के संरक्षण में फारस और मध्य एशिया से आए कुशल कारीगरों ने बीकानेर में स्थापित किया। इस विशेष शिल्प के लिए जाना जाने वाला उस्ता समुदाय कई शताब्दियों से इस परंपरा को संजोए हुए है।
उस्ता कला को किस भौगोलिक संकेत (GI) के रूप में मान्यता मिली है?
उस्ता कला को बीकानेर की विशिष्ट कला के रूप में भौगोलिक संकेत (GI) मान्यता प्राप्त है। यह मान्यता इसकी अनूठी उत्पत्ति को प्रमाणित करती है और क्षेत्र की पारंपरिक शिल्प पहचान की रक्षा करती है।
राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत के लिए गणतंत्र दिवस झाँकी का क्या महत्व है?
कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस झाँकी राज्यों को अपनी सांस्कृतिक विरासत राष्ट्रीय स्तर पर दिखाने का अवसर देती है। राजस्थान की 2026 की झाँकी ने उस्ता कला को राष्ट्रीय पहचान दिलाई और CM भजन लाल शर्मा ने इसे राजस्थान के कारीगर समुदायों के लिए गर्व का विषय बताया।