मुख्य तथ्य

  • 1730 में जोधपुर राज्य के खेजड़ली गांव में अमृता देवी बिश्नोई और 363 लोगों ने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए बलिदान दिया;
  • गुरु जांभेश्वर ने 1485 में बिश्नोई परंपरा को 29 नियमों पर संगठित किया; इनमें हरित वृक्ष न काटना और जीव-दया जैसे सिद्धांत प्रमुख हैं।
  • चिपको आंदोलन 1973 में उत्तराखंड के चमोली क्षेत्र से उभरा; इसका मुख्य तरीका पेड़ों से चिपककर कटाई रोकना था।
  • 1974 में रैणी गांव की गौरा देवी और महिला मंडल ने चिपको आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाई; इससे वन संरक्षण में महिलाओं की भूमिका प्रमुख बनी।
  • अप्पिको आंदोलन 1983 में कर्नाटक में शुरू हुआ और चिपको की तरह विनाशकारी वन-दोहन के विरुद्ध पेड़ों से चिपकने तथा जन-जागरण पर आधारित था।

मुख्य बिंदु

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    1730 में जोधपुर राज्य के खेजड़ली गांव में अमृता देवी बिश्नोई और 363 लोगों ने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए बलिदान दिया; यह भारत के सबसे पुराने जन-आधारित वन संरक्षण उदाहरणों में गिना जाता है।

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    गुरु जांभेश्वर ने 1485 में बिश्नोई परंपरा को 29 नियमों पर संगठित किया; इनमें हरित वृक्ष न काटना और जीव-दया जैसे सिद्धांत प्रमुख हैं।

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    चिपको आंदोलन 1973 में उत्तराखंड के चमोली क्षेत्र से उभरा; इसका मुख्य तरीका पेड़ों से चिपककर कटाई रोकना था।

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    1974 में रैणी गांव की गौरा देवी और महिला मंडल ने चिपको आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाई; इससे वन संरक्षण में महिलाओं की भूमिका प्रमुख बनी।

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    राजस्थान में ओरन और देव-वन समुदाय द्वारा संरक्षित पवित्र वन-क्षेत्र हैं; ये स्थानीय जल, चारा, जैव-विविधता और धार्मिक आस्था से जुड़े रहते हैं।

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    अप्पिको आंदोलन 1983 में कर्नाटक में शुरू हुआ और चिपको की तरह विनाशकारी वन-दोहन के विरुद्ध पेड़ों से चिपकने तथा जन-जागरण पर आधारित था।

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    साइलेंट वैली आंदोलन ने केरल की जलविद्युत परियोजना का विरोध किया और उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन को संरक्षण दिलाया; यह क्षेत्र 1984 में राष्ट्रीय उद्यान बना।

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    नर्मदा बचाओ आंदोलन, मेधा पाटकर और बाबा आमटे जैसे कार्यकर्ताओं से जुड़ा, बांध, विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय न्याय के प्रश्नों को राष्ट्रीय बहस में लाया।

पर्यावरण आंदोलन क्या होते हैं और परीक्षा में उनका महत्व क्यों है?

पर्यावरण आंदोलन वे संगठित सामाजिक प्रयास हैं जिनमें लोग वन, जल, भूमि, वन्यजीव, चरागाह, नदी या स्थानीय पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए खड़े होते हैं, और वनपाल जैसी परीक्षा में उनका महत्व इसलिए है कि संरक्षण कानून, समुदाय और आजीविका के संबंध को समझे बिना पूरा नहीं होता। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार भारतीय वन सर्वेक्षण की भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 में देश का वन और वृक्ष आवरण 8,27,357 वर्ग किलोमीटर, यानी भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% बताया गया है। पर्यावरण आंदोलन उन सामूहिक प्रयासों को कहा जाता है जिनमें लोग वन, जल, भूमि, वन्यजीव, चरागाह, नदी या स्थानीय पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए संगठित होते हैं। ये केवल विरोध प्रदर्शन नहीं होते; कई बार ये परंपरा, आजीविका, धार्मिक विश्वास, स्थानीय अधिकार और वैज्ञानिक चेतना का मिला-जुला रूप होते हैं। वनपाल और वनरक्षक जैसी परीक्षा में इन आंदोलनों का महत्व इसलिए है कि वन संरक्षण केवल कानून से नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की भागीदारी से भी सफल होता है।

भारत में पर्यावरण आंदोलनों की खास बात यह रही कि उनका आधार अक्सर गांव, जंगल और जीविका रहा। हिमालय में पेड़ कटने से भूस्खलन और जल-स्रोत प्रभावित होते थे, इसलिए चिपको जैसे आंदोलन उभरे। पश्चिमी राजस्थान में खेजड़ी, रोहिड़ा, गोचर और ओरन जैसे संसाधन जीवन का आधार रहे, इसलिए बिश्नोई परंपरा और खेजड़ली बलिदान को विशेष महत्व मिलता है। उम्मीदवार को आंदोलन, स्थान, नेतृत्व, वर्ष और मुख्य उद्देश्य को साथ जोड़कर याद रखना चाहिए। इस विषय में केवल नाम याद करना काफी नहीं है; परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि किस आंदोलन में कौन-सा संसाधन बचाया गया, किस समुदाय या व्यक्ति की भूमिका रही और उसका संरक्षण-तर्क क्या था।

याद रखने योग्य बात: पर्यावरण आंदोलन का मूल उद्देश्य प्रकृति और आजीविका के बीच संतुलन बनाना है, न कि केवल किसी एक परियोजना का विरोध करना।

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